रांची (RANCHI):   साढ़े चार शताब्दियों से अधिक पुरानी परंपरा, मां राजराजेश्वरी की आराधना और दशमी पर ‘शत्रु बलि’ का अनूठा विधान। आंदुल के दत्तचौधरी परिवार की दुर्गापूजा आज भी अपनी ऐतिहासिक विरासत और विशिष्ट रीति-रिवाजों के लिए अलग पहचान रखती है। वर्ष 1568 में शुरू हुई इस पूजा का 459वां वर्ष है। यहां पशुबलि के बजाय चावल के आटे से बने पुतले की प्रतीकात्मक बलि दी जाती है।

बंगाल की प्राचीन दुर्गापूजाओं में शुमार आंदुल के दत्तचौधरी परिवार की पूजा इस वर्ष 459वें वर्ष में प्रवेश कर गई है। इस पूजा की प्रमुख विशेषता यह है कि यहां सदियों पुरानी पारिवारिक परंपराएं आज भी निभाई जाती हैं। इन्हीं में एक है दशमी के दिन होने वाली ‘शत्रु बलि’, जिसमें चावल के आटे से बनी प्रतीकात्मक प्रतिमा की बलि दी जाती है। इसे शत्रुओं पर विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

परिवार के ठाकुरदालान के सामने लगे शिलालेख के अनुसार, इस दुर्गापूजा की शुरुआत रामशरण दत्त ने 1568 ईस्वी (975 बंगाब्द/1490 शकाब्द) में की थी। उस समय बंगाल में पठान शासकों का शासन था। इतिहासकार भी इस पूजा की प्राचीनता को स्वीकार करते हैं।

पूजा के इतिहास के बारे में जानकारी देते हुए इसके संस्थापक रामशरण चौधरी के 11वें वंशज ध्रुव दत्तचौधरी बताते हैं कि लगभग 1380 ईस्वी में बंगाल के सुल्तान सिकंदर शाह के शासनकाल में उनके पूर्वज तेकड़ी दत्त को तत्कालीन मुजफ्फरपुर परगना में राजस्व वसूली के कार्य के लिए ‘चौधरी’ की उपाधि मिली थी। इसके बाद वे अपने पैतृक निवास बालिग्राम से सरस्वती नदी के पश्चिमी तट पर स्थित आंदुल आकर बस गए। यहां उन्होंने समाज सुधार के कार्यों के साथ भव्य आवास और देवोत्तर संपत्तियों की स्थापना की। इसी के साथ आंदुल में दत्तचौधरी वंश के इतिहास की शुरुआत हुई।

तेकड़ी दत्त की छठी पीढ़ी में रामशरण दत्त हुए। उस समय बंगाल में राजनीतिक अस्थिरता थी। पठान शासन के दौरान सरस्वती नदी के रास्ते पुर्तगाली और मग समुद्री लुटेरों के हमलों से स्थानीय लोग परेशान रहते थे। पारिवारिक इतिहास के अनुसार, ऐसे ही संकट के दौर में कुलगुरु के परामर्श पर रामशरण चौधरी ने दुर्गापूजा की शुरुआत की। इसे अश्वमेध यज्ञ के समान धार्मिक महत्त्व वाला महापर्व माना गया। तब से साढ़े चार शताब्दियों से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन पूजा की परंपरा आज भी जारी है।

दत्तचौधरी परिवार में महिषासुरमर्दिनी मां दुर्गा की पूजा ‘राजराजेश्वरी’ के रूप में की जाती है। यहां की प्रतिमा और उसके पीछे बने चालचित्र की अपनी विशिष्ट पहचान है। देवी की पृष्ठभूमि पारंपरिक ‘टानाचौरी’ शैली में तैयार की जाती है।

मां लक्ष्मी के चालचित्र में देवी जगद्धात्री का चित्र बनाया जाता है और उसके ऊपर देवी जया की छोटी प्रतिमा स्थापित की जाती है। मां सरस्वती के चालचित्र में दक्षिणाकाली का चित्र होता है, जिसके ऊपर देवी विजया विराजमान रहती हैं। मां दुर्गा के मुख्य चालचित्र में अनंत विष्णु का चित्र और सबसे ऊपर ध्यानमग्न भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित की जाती है। देवी का वाहन सिंह घोड़े के आकार का होता है, जबकि मां लक्ष्मी और मां सरस्वती कमल पर खड़ी दिखाई देती हैं।

परिवार में शुरुआत में पूजा के लिए आठचाला मंदिर था। वर्ष 1630 के आसपास ईंट और खपरैल से बने इस मंदिर की जगह पक्का ठाकुरदालान बनाया गया। वर्ष 1930 में वर्तमान ठाकुरदालान का पुनर्निर्माण हुआ। इसके समीप चार शिव मंदिर भी हैं, जिनमें दो आठचाला शैली में निर्मित हैं।

दत्तचौधरी परिवार की दुर्गापूजा की एक प्रमुख विशेषता दशमी के अनुष्ठानों में शाक्त और वैष्णव परंपराओं का संगम है। यहां बृहन्नंदिकेश्वर पुराण के विधान के साथ वैष्णव परंपराओं का भी पालन किया जाता है। पशुबलि के स्थान पर ‘शत्रु बलि’ की परंपरा निभाई जाती है। चावल के आटे से पुतला बनाकर उसकी प्रतीकात्मक बलि दी जाती है। इसके अलावा पेठे और गन्ने की बलि भी दी जाती है।

नवमी के दिन कुमारी पूजा के बाद धुनो पोड़ानो की रस्म होती है। दशमी पर परिवार की महिलाएं प्रतिमा का वरण करती हैं। इसके बाद शोभायात्रा के साथ मां दुर्गा को दुल्लेपाड़ा ले जाया जाता है, जहां मोहल्ले की महिलाएं भी देवी का वरण करती हैं। इसके बाद प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

सप्तमी, अष्टमी और नवमी—तीनों दिन मां राजराजेश्वरी को अन्नभोग अर्पित किया जाता है। प्रसाद वितरण के दौरान परिवार के सदस्यों के बीच आज भी ‘बाबा, रामशरण की कड़ाही पकड़ो’ कहने की पुरानी परंपरा प्रचलित है।

दत्तचौधरी परिवार की दुर्गापूजा में पारंपरिक मिठाई ‘आगमंडा’ भी विशेष आकर्षण है। बंगाल की यह विलुप्तप्राय मिठाई क्षीर, नारियल, चीनी और मेवे से तैयार की जाती है। इसका स्वाद अमृत के समान माना जाता है। इस तरह आंदुल के दत्तचौधरी परिवार की दुर्गापूजा धार्मिक अनुष्ठानों, विशिष्ट कलात्मक परंपराओं और पारिवारिक विरासत को सहेजते हुए आज भी जारी है।