रांची (RANCHI): करीब दो शताब्दी पुरानी दुर्गापूजा की परंपरा, पूर्वजों की विरासत और एक हृदयविदारक घटना की स्मृति। हावड़ा के संकराइल थाने के राजगंज स्थित पाल परिवार की दुर्गापूजा इन सभी का अनूठा संगम है। समय के साथ भले ही इस पूजा की पुरानी भव्यता कुछ कम हुई हो, लेकिन पारंपरिक रीति-रिवाजों और धार्मिक अनुष्ठानों के पालन में आज भी कोई कमी नहीं आई है। इस पूजा की सबसे खास बात यह है कि यहां बंगाल के अन्य हिस्सों की तरह दशमी को नहीं, बल्कि अष्टमी के दिन ही सिंदूर खेला होता है। इसके पीछे परिवार के एक युवा सदस्य की असमय मृत्यु से जुड़ी मार्मिक कहानी है।


परिवार के लिए मिलन का पर्व

पाल परिवार के घर के सामने से गंगा नदी बहती है। शरद ऋतु में गंगा की ठंडी हवाओं के साथ काश के फूलों और शिउली की सुगंध इस घर के ठाकुरदालान में देवी के आगमन का संदेश लेकर आती है। दुर्गापूजा का अवसर इस परिवार के लिए मिलन का पर्व भी है। दूसरे जिलों, पड़ोसी राज्यों और विदेशों में रहने वाले परिवार के सदस्य हर साल इस उत्सव में शामिल होने के लिए लौटते हैं। 
राजगंज में गंगा के किनारे स्थित विशाल महलनुमा भवन और उससे सटा विस्तृत ठाकुरदालान इस परिवार की ऐतिहासिक विरासत के साक्षी हैं। करीब 188 वर्ष पहले गंगा के कटाव में पुराना घर समा जाने के बाद परिवार के पूर्वज और जमींदार नफरचंद्र पाल ने वर्तमान भवन का निर्माण कराया था।

इस दुर्गापूजा की शुरुआत नफरचंद्र पाल के पिता चूड़ामणि पाल ने की

परिवार के सदस्य स्वरूप पाल के अनुसार, इस दुर्गापूजा की शुरुआत नफरचंद्र पाल के पिता चूड़ामणि पाल ने की थी। चूड़ामणि पाल आंदुल राजबाड़ी के दीवान थे। उनके कार्यों से प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें पुरस्कारस्वरूप काफी जमीन करमुक्त रूप से दी थी। साथ ही आसपास के इलाकों में जमींदारी की जिम्मेदारी भी सौंपी थी। इसी दौर में परिवार में दुर्गापूजा की शुरुआत हुई। 
हालांकि, पाल परिवार की आर्थिक समृद्धि नफरचंद्र पाल के समय में बढ़ी। जमींदारी के साथ-साथ उन्होंने व्यवसाय भी शुरू किया। नफरचंद्र पाल, जिन्हें एनसी पाल के नाम से भी जाना जाता था, के बनाए ईंटों की ख्याति ब्रिटेन तक पहुंची थी। ब्रिटिश शासन के दौरान भी इन ईंटों का इस्तेमाल होता था। उन्हीं के समय में परिवार की दुर्गापूजा का विस्तार हुआ।

पूजा के सुचारु संचालन के लिए देवोत्तर एस्टेट की स्थापना की गई  

नफरचंद्र पाल ने भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पूजा के सुचारु संचालन के लिए देवोत्तर एस्टेट की स्थापना की थी। परिवार के विभिन्न व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से पूरे वर्ष इसमें धन जमा होता है। इसी व्यवस्था के सहारे आज भी पाल परिवार की दुर्गापूजा आयोजित होती है।

पारंपरिक डाक की सजावट से सजाया जाता है दुर्गाप्रतिमा

परिवार की दुर्गाप्रतिमा एकचाला शैली की है और इसे पारंपरिक डाक की सजावट से सजाया जाता है। प्रतिमा का निर्माण ठाकुरदालान में ही होता है। पुरोहित से लेकर ढाक बजाने वाले तक, सभी पीढ़ियों से इस पूजा का हिस्सा बनते आ रहे हैं। महालया से चंडीपाठ शुरू हो जाता है। वैष्णव परंपरा के अनुसार पूजा होने के कारण यहां पशुबलि नहीं दी जाती। संधिपूजा के दौरान 108 मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं। देवी को घर में तैयार बूंदी और अन्य मिठाइयों का भोग अर्पित किया जाता है। लेकिन इस पूजा की सबसे विशिष्ट और भावुक कर देने वाली परंपरा अष्टमी के दिन सिंदूर खेला है। बंगाल में आम तौर पर विजयादशमी के दिन विवाहित महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर देवी को विदाई देती हैं। इसके विपरीत, पाल परिवार में यह रस्म अष्टमी को ही निभाई जाती है।इसके पीछे परिवार के एक सदस्य की असमय मृत्यु की कहानी है। बताया जाता है कि परिवार के एक युवा सदस्य की महज 18 वर्ष की उम्र में अष्टमी के दिन मृत्यु हो गई थी। घर के बेटे की अचानक मौत से पूरा परिवार शोक में डूब गया। इसके बावजूद देवी की आराधना में कोई बाधा न आए, इसलिए उस दिन घर में ही शव रखकर सिंदूर खेला सहित सभी धार्मिक अनुष्ठान पूरे किए गए और अष्टमी को ही देवी का विसर्जन कर दिया गया। उस घटना के बाद से ही पाल परिवार में अष्टमी के दिन सिंदूर खेला करने की परंपरा चली आ रही है। इस रस्म में परिवार की महिलाओं के साथ गांव और दूर-दराज के इलाकों से आने वाली विवाहित महिलाएं भी शामिल होती हैं।

इतिहास, आस्था और पारिवारिक स्मृतियों का अनूठा दस्तावेज

राजगंज के पाल परिवार की दुर्गापूजा इस तरह इतिहास, आस्था और पारिवारिक स्मृतियों का अनूठा दस्तावेज बनी हुई है। उत्सव की खुशियों के पीछे छिपी एक दुखद घटना की स्मृति आज भी इस परंपरा में जीवित है। करीब दो शताब्दियों से चली आ रही इस विरासत को बनाए रखने के लिए परिवार के वरिष्ठ सदस्य नई पीढ़ी को पारंपरिक रीति-रिवाजों से परिचित करा रहे हैं।