नई दिल्ली: वर्ष 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश के मामले में पूर्व जेएनयू छात्र उमर खालिद और छात्र कार्यकर्ता शरजील इमाम ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। दोनों ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं। दोनों आरोपियों ने अपनी याचिकाओं में मुकदमे की सुनवाई में हो रही देरी और गवाहों की जांच शुरू नहीं होने का मुद्दा उठाया है।

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी 2026 को अपने पिछले आदेश में उमर खालिद और शरजील इमाम को एक साल बाद या संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने पर, इनमें से जो पहले हो, दोबारा जमानत मांगने की छूट दी थी। अब दोनों आरोपियों का कहना है कि अभियोजन पक्ष ने अभी तक किसी गवाह की जांच नहीं की है और उनकी लंबे समय से जारी हिरासत पर फिर से विचार किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में फिर दाखिल की जमानत याचिका

5 नवंबर 2026 को सामने आई जानकारी के अनुसार, उमर खालिद और शरजील इमाम ने अलग-अलग याचिकाओं के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से जमानत देने की मांग की है। दोनों ने दिल्ली हाईकोर्ट के 30 सितंबर 2026 के फैसले को चुनौती दी है।

उनका तर्क है कि वे करीब छह वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद हैं, लेकिन मामले में अब तक अभियोजन पक्ष की ओर से किसी गवाह की गवाही दर्ज नहीं कराई गई है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जब मुकदमे की सुनवाई आगे नहीं बढ़ रही है और संरक्षित गवाहों की जांच भी पूरी नहीं हुई है, तो लंबे समय तक जेल में रखना उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा करता है।

उमर खालिद की ओर से अधिवक्ता एन. साई विनोद और शरजील इमाम की ओर से अधिवक्ता फौजिया शकील ने याचिकाएं दाखिल की हैं।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का एक साल वाला आदेश?

इस पूरे मामले में 5 जनवरी 2026 का सुप्रीम कोर्ट का आदेश बेहद महत्वपूर्ण है। उस दिन न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था।

हालांकि, इसी मामले में पांच अन्य आरोपियों को जमानत दी गई थी। अदालत ने उमर खालिद और शरजील इमाम की कथित भूमिका को अन्य आरोपियों से अलग बताते हुए कहा था कि अभियोजन के अनुसार उनकी भूमिका कथित साजिश के वैचारिक संचालन से जुड़ी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि संरक्षित गवाहों की जांच पूरी होने या आदेश की तारीख से एक वर्ष बीतने पर, जो भी पहले हो, दोनों आरोपी संबंधित अदालत में दोबारा जमानत की मांग कर सकते हैं।

इस आदेश के मुताबिक एक साल की अवधि 5 जनवरी 2027 को पूरी होगी। ऐसे में दोनों आरोपियों ने समयसीमा पूरी होने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 30 सितंबर को क्यों खारिज की थी जमानत?

सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद उमर खालिद और शरजील इमाम ने निचली अदालत में जमानत के लिए आवेदन किया था। हालांकि, 4 जुलाई 2026 को ट्रायल कोर्ट ने उनकी याचिकाएं खारिज कर दी थीं।

इसके बाद दोनों ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 30 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति दिनेश भट्ट की पीठ ने भी उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।

हाईकोर्ट का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी के आदेश के मद्देनजर वह उस आदेश में बदलाव नहीं कर सकता। अदालत ने न्यायिक अनुशासन का हवाला देते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया।

900 से अधिक गवाह, लेकिन अब तक किसी की गवाही नहीं

इस मामले में सुनवाई की धीमी रफ्तार दोनों आरोपियों की नई याचिकाओं का प्रमुख आधार है।

शरजील इमाम की याचिका के अनुसार, मामले में 18 आरोपी मुकदमे का सामना कर रहे हैं और अभियोजन पक्ष ने 900 से अधिक गवाहों की सूची पेश की है। इनमें 47 संरक्षित गवाह भी शामिल हैं।

उमर खालिद और शरजील इमाम की ओर से दावा किया गया है कि इतने लंबे समय तक हिरासत में रहने के बावजूद अभियोजन पक्ष ने अब तक एक भी गवाह की जांच नहीं कराई है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मुकदमे की प्रक्रिया में हो रही देरी के कारण उनकी स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है। उनका तर्क है कि बिना सुनवाई पूरी हुए लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार तथा शीघ्र सुनवाई के सिद्धांत से जुड़ा सवाल है।

चार्ज फ्रेम करने की प्रक्रिया में भी अटका मामला

मामले की सुनवाई में देरी का एक अन्य कारण चार्ज फ्रेम करने की प्रक्रिया से जुड़ा बताया जा रहा है।

रिपोर्टों के मुताबिक, 13 जुलाई 2026 को आरोप तय करने को लेकर सभी पक्षों की दलीलें पूरी हो गई थीं। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने एक सह-आरोपी देवांगना कलिता की याचिका से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करने का निर्णय लिया।

यह विवाद पुलिस द्वारा जुटाए गए उन दस्तावेजों से जुड़ा है, जिन पर अभियोजन पक्ष ने भरोसा नहीं किया है। इन दस्तावेजों को देखने की अनुमति से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रखा था।

इस वजह से निचली अदालत में आगे की प्रक्रिया प्रभावित हुई है।

फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में क्या हुआ था?

यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा से जुड़ा है। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच दिल्ली के कई इलाकों में हिंसा भड़क गई थी।

इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। कई घरों, दुकानों और सार्वजनिक संपत्तियों को भी नुकसान पहुंचा था।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इस हिंसा के पीछे बड़ी साजिश होने का आरोप लगाते हुए FIR संख्या 59/2020 दर्ज की थी। इस मामले में उमर खालिद, शरजील इमाम समेत कुल 18 आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA और भारतीय दंड कानूनों के तहत आरोप लगाए गए हैं।

पुलिस का आरोप है कि हिंसा अचानक नहीं हुई थी, बल्कि इसके पीछे एक व्यापक साजिश थी। वहीं आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के तहत होना बाकी है।

UAPA और लंबे समय तक जेल में रहने का कानूनी सवाल

इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी बहस UAPA के तहत जमानत की सख्त शर्तों और लंबे समय तक विचाराधीन कैदियों को जेल में रखने के सवाल से जुड़ी है।

उमर खालिद ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट के अन्य फैसलों का भी हवाला दिया है, जिनमें मुकदमे में अत्यधिक देरी और लंबे समय तक हिरासत को जमानत पर विचार करने का आधार माना गया है।

विशेष रूप से के.ए. नजीब मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि लंबे समय तक मुकदमा पूरा होने की संभावना नहीं होने पर संवैधानिक स्वतंत्रता के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इसी तरह UAPA के कठोर जमानत प्रावधानों और शीघ्र सुनवाई के संवैधानिक अधिकार के बीच कानूनी व्याख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी पीठ के विचार के लिए भी सवाल भेजा गया है।

अब आगे क्या होगा?

अब उमर खालिद और शरजील इमाम की नई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का रुख महत्वपूर्ण होगा। अदालत के सामने मुख्य रूप से ये सवाल होंगे:

  1. क्या लंबे समय तक जेल में रहने और गवाहों की जांच शुरू नहीं होने को जमानत पर पुनर्विचार का आधार माना जा सकता है?

  2. क्या अभियोजन पक्ष की ओर से मुकदमे में हो रही देरी आरोपियों के संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित कर रही है?

  3. क्या 5 जनवरी 2026 के पुराने आदेश की शर्तों के बावजूद वर्तमान परिस्थितियों में जमानत पर विचार किया जा सकता है?

  4. क्या UAPA के कठोर प्रावधानों और शीघ्र सुनवाई के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित किया जाना चाहिए?

फिलहाल दोनों आरोपियों को जमानत मिलने का कोई नया आदेश सामने नहीं आया है। उनकी याचिकाओं पर आगे की न्यायिक कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।