सावन विशेष : भगवान शिव का अद्भुत स्वरूप और उसमें छिपा जीवन-दर्शन : उदय कुमार सिंह
"गले सर्पों का हार है, वस्त्र व्याघ्र की खाल है।त्रिशूल-डमरूधारी, बाबा भोले भंडारी की महिमा अपरंपार है।"
मानव
जीवन के समस्त पापों, कष्टों और संतापों का शमन करने वाला पावन सावन मास
आरंभ हो चुका है। देशभर के शिवालयों में श्रद्धालुओं का भीड़ उमड़ रही है।
हर ओर "हर-हर महादेव" और "बम-बम भोले" के जयघोष गूंज रहे हैं। शिवभक्त
भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना कर सुख, समृद्धि, आरोग्य और
मोक्ष का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना कर रहे हैं।
सावन का महीना
केवल जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और व्रत-उपवास तक सीमित नहीं है। यह
आत्मशुद्धि, संयम, तप और शिवत्व को अपने जीवन में उतारने का भी अवसर है। इस
पूरे महीने आप भी किसी न किसी शिवालय में जाकर भगवान शिव की आराधना कर रहे
हैं लेकिन क्या आपने कभी यह जानने का प्रयास किया है कि भगवान शिव का
स्वरूप ऐसा क्यों है? उन्होंने अपने शरीर पर जो कुछ धारण किया है, उसका
क्या महत्व है? क्या यह केवल पौराणिक अलंकरण है या फिर हर प्रतीक के पीछे
कोई गहन आध्यात्मिक संदेश छिपा है?
वास्तव में भगवान शिव का स्वरूप
जितना अलौकिक दिखाई देता है, उतना ही गूढ़ और दार्शनिक भी है। उनकी विशाल
जटाओं से लेकर मस्तक पर सुशोभित चंद्रमा, तीसरे नेत्र, नीलकंठ, गले में
लिपटे सर्प, मुंडमाला, त्रिशूल, डमरू, व्याघ्रचर्म, भस्म और नंदी इन सभी का
अपना विशिष्ट महत्व है। शिव का प्रत्येक अंग और प्रत्येक आभूषण जीवन को
सही दिशा देने वाली शिक्षा प्रदान करता है।
क्या वास्तव में भगवान
शिव का स्वरूप ऐसा ही था?सनातन परंपरा में शिव को साकार और निराकार दोनों
रूपों में स्वीकार किया गया है। वे कण-कण में विद्यमान हैं इसलिए उन्हें
किसी एक स्वरूप में सीमित नहीं किया जा सकता।
फिर भी आज जो शिव
स्वरूप प्रचलित है, वह निराधार नहीं है। पुराणों, वेदों, उपनिषदों और
विभिन्न धार्मिक आख्यानों में भगवान शिव के गुण, कर्म और लीलाओं का जो
वर्णन मिलता है, उसी के आधार पर कलाकारों और मूर्तिकारों ने उनके स्वरूप की
कल्पना की। इसलिए शिव का प्रत्येक प्रतीक उनके व्यक्तित्व और उनके दिव्य
संदेश का प्रतिनिधित्व करता है।
आइए जानते हैं भगवान शिव के स्वरूप में निहित आध्यात्मिक रहस्यों को।
जटाएं
: अनंत ब्रह्मांड और तप का प्रतीकभगवान शिव की विशाल जटाएं केवल उनके योगी
स्वरूप का परिचय नहीं देतीं, बल्कि वे संपूर्ण ब्रह्मांड का भी प्रतीक
हैं। जिस प्रकार अंतरिक्ष में असंख्य ग्रह, नक्षत्र, आकाशगंगाएं और
तारामंडल विद्यमान हैं, उसी प्रकार शिव की जटाएं अनंत सृष्टि का बोध कराती
हैं। इन्हीं जटाओं में मां गंगा का अवतरण हुआ और मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित
हैं। जटाएं यह भी दर्शाती हैं कि शिव पूर्ण योगी हैं, जिन्होंने सांसारिक
आकर्षणों पर विजय प्राप्त कर तप और आत्मसंयम को अपनाया।
मां गंगा :
करुणा और जीवन का प्रवाहपौराणिक कथा के अनुसार जब मां गंगा पृथ्वी पर
अवतरित हुईं, तब उनके तीव्र वेग को संभालने के लिए भगवान शिव ने उन्हें
अपनी जटाओं में धारण किया। यह प्रसंग केवल कथा नहीं बल्कि यह संदेश देता है
कि शक्ति तभी कल्याणकारी बनती है जब उस पर संयम का नियंत्रण हो। शिव की
जटाओं से प्रवाहित होती गंगा जीवन, पवित्रता, करुणा और लोककल्याण की प्रतीक
हैं।
चंद्रमा : शांत और निर्मल मन का प्रतीकसमुद्र मंथन से निकले
चौदह रत्नों में चंद्रमा भी एक थे। भगवान शिव ने उन्हें अपने मस्तक पर
स्थान दिया। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा मन का कारक माना जाता है। शिव के
मस्तक पर विराजमान चंद्रमा यह संदेश देता है कि मन सदैव शांत, संतुलित और
निर्मल होना चाहिए। परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, स्थिर मन
वाला व्यक्ति ही सही निर्णय ले सकता है।
त्रिनेत्र : ज्ञान और
चेतना का प्रतीकभगवान शिव त्रिनेत्रधारी हैं। उनके तीन नेत्र केवल तीन
आंखें नहीं, बल्कि तीन प्रकार की चेतना का प्रतीक हैं। ये तीनों नेत्र भूत,
वर्तमान और भविष्य के ज्ञान, सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों की समझ तथा
स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तीनों लोकों पर दृष्टि का संकेत देते हैं। शिव का
तीसरा नेत्र दिव्य ज्ञान का प्रतीक है। जब यह खुलता है तो अज्ञान, अधर्म और
अहंकार का अंत हो जाता है।
नीलकंठ : विष को भी स्वीकार करने का
साहससमुद्र मंथन के समय निकले कालकूट विष से संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़
गई थी। तब भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए उस विष का पान कर लिया। माता
पार्वती ने उसे उनके कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया, जिससे उनका कंठ नीला हो
गया और वे नीलकंठ कहलाए। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि महान व्यक्ति समाज
की पीड़ा स्वयं सह लेते हैं लेकिन उसे दूसरों तक नहीं पहुंचने देते।
सर्पों
का हार : नकारात्मक प्रवृत्तियों पर नियंत्रणसर्प सामान्यतः भय, मृत्यु और
तमोगुण का प्रतीक माना जाता है। भगवान शिव ने उसे अपने गले का आभूषण बना
लिया। इसका अर्थ है कि जिसने अपने भय, क्रोध, मोह और नकारात्मक
प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर ली, वही सच्चा योगी है। शिव यह संदेश देते
हैं कि मनुष्य को अपनी दुर्बलताओं का दास नहीं बल्कि स्वामी बनना चाहिए।
मुंडमाला
: मृत्यु के शाश्वत सत्य का बोधभगवान शिव के गले में सुशोभित मुंडमाला
जीवन और मृत्यु के सनातन चक्र का प्रतीक है। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार
यह देवी शक्ति के अनेक जन्मों का प्रतीक है, जबकि दार्शनिक दृष्टि से यह
बताती है कि जन्म और मृत्यु प्रकृति का अटल नियम हैं। शिव मृत्यु के भी
स्वामी हैं। इसलिए वे हमें मृत्यु से भयभीत होने के बजाय उसे जीवन का
स्वाभाविक सत्य स्वीकार करने की प्रेरणा देते हैं।
त्रिशूल : तीन
प्रकार के तापों का नाशभगवान शिव का प्रमुख आयुध त्रिशूल है। इसके तीन फलक
दैहिक, दैविक और भौतिक इन तीन प्रकार के तापों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
दैहिक अर्थात शरीर और मन के कष्ट, दैविक अर्थात प्राकृतिक अथवा दैवी संकट
तथा भौतिक अर्थात सांसारिक दुख। शिव का त्रिशूल इन सभी कष्टों के विनाश का
प्रतीक है।
डमरू : सृष्टि के प्रथम नाद का प्रतीकभगवान शिव के हाथ
में स्थित डमरू सृष्टि की आदिम ध्वनि का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है
कि डमरू के नाद से महेश्वर सूत्र प्रकट हुए, जिनसे संस्कृत व्याकरण की
आधारशिला रखी गई। शिव का तांडव केवल विनाश नहीं बल्कि नवसृजन की भूमिका भी
है। जब पुराना समाप्त होता है, तभी नए युग का आरंभ होता है। इसलिए डमरू
परिवर्तन, सृजन और जीवन की निरंतरता का प्रतीक है।
व्याघ्रचर्म :
शक्ति पर संयम का संदेशभगवान शिव अपने शरीर पर व्याघ्रचर्म धारण करते हैं।
बाघ शक्ति, हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। शिव यह संदेश देते हैं
कि शक्ति आवश्यक है, लेकिन उसका उपयोग केवल धर्म और न्याय की रक्षा के लिए
होना चाहिए। स्वाभिमान मनुष्य का आभूषण है, परंतु अहंकार उसका सबसे बड़ा
शत्रु।
भस्म : संसार की नश्वरता का संदेशभगवान शिव अपने शरीर पर
भस्म धारण करते हैं। यह भस्म हमें याद दिलाती है कि शरीर, धन, वैभव और
संसार की प्रत्येक वस्तु नश्वर है। एक दिन सब कुछ मिट्टी में मिल जाएगा।
इसलिए मनुष्य को अहंकार त्यागकर सत्य, सेवा और सदाचार के मार्ग पर चलना
चाहिए।
नंदी : धर्म, निष्ठा और समर्पण का प्रतीकभगवान शिव के वाहन
नंदी केवल एक बैल नहीं हैं। धर्मशास्त्रों में वृषभ को धर्म का प्रतीक माना
गया है। नंदी के चार पैर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों का
प्रतिनिधित्व करते हैं। शिव मंदिरों में नंदी सदैव शिवलिंग की ओर एकटक
देखते हुए दिखाई देते हैं, जो अटूट श्रद्धा, समर्पण और एकाग्रता का
सर्वोच्च उदाहरण है।
शिव का संपूर्ण स्वरूप क्या सिखाता है?भगवान
शिव का पूरा स्वरूप संतुलन का संदेश देता है। वे योगी भी हैं और आदर्श
गृहस्थ भी। वे संहारक भी हैं और कल्याणकारी भी। वे वैराग्य के प्रतीक भी
हैं और परिवार के संरक्षक भी। उनकी जटाएं संयम सिखाती हैं, चंद्रमा मन की
शीतलता का संदेश देता है, तीसरा नेत्र विवेक का प्रतीक है, सर्प भय पर विजय
का, त्रिशूल कष्टों के विनाश का, डमरू सृजन का, व्याघ्रचर्म अहंकार पर
नियंत्रण का, भस्म नश्वरता का और नंदी धर्म के मार्ग पर अडिग रहने की
प्रेरणा देता है।
जिसने परमात्मा का साक्षात् अनुभव कर लिया, वह उस
दिव्य अनुभूति को शब्दों में व्यक्त करने में स्वयं को असमर्थ पाता है।
इसलिए ऋषि-मुनियों ने ईश्वर के स्वरूप को प्रतीकों के माध्यम से समझाने का
प्रयास किया। भगवान शिव का प्रत्येक प्रतीक जीवन-दर्शन का एक अध्याय है।
सावन
का यह पावन महीना केवल शिवलिंग पर जल अर्पित करने का अवसर नहीं बल्कि
भगवान शिव के गुणों संयम, करुणा, धैर्य, त्याग, संतुलन, निर्भयता और
लोककल्याण की भावना को अपने जीवन में उतारने का भी समय है। जब मनुष्य इन
गुणों को आत्मसात कर लेता है, तभी उसकी शिवभक्ति पूर्ण मानी जाती है। यही
भगवान भोलेनाथ के दिव्य स्वरूप का वास्तविक संदेश है।(लेखक, हिन्दुस्थान
समाचार से संबद्ध हैं।)















