अमेरिका के मिडटर्म चुनाव का झटका और इजरायल की राजनीति: नेतन्याहू की सत्ता पर संकट, प्रधानमंत्री पद की दौड़ में तेज हुई आरोप-प्रत्यारोप की जंग
तेल अवीव/वॉशिंगटन: अमेरिका के मध्यावधि चुनाव (Midterm Elections) के नतीजों का असर अब इजरायल की घरेलू राजनीति पर भी दिखाई देने लगा है। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक स्थिति को मिले झटके ने इजरायल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक रणनीति और आगामी नेतृत्व की दौड़ को नई दिशा दे दी है। इजरायल की राजनीति में अमेरिका का प्रभाव हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। खासकर सुरक्षा, सैन्य सहायता, ईरान नीति और मध्य पूर्व में कूटनीतिक संबंधों के मामले में वॉशिंगटन की भूमिका काफी अहम है। ऐसे में अमेरिकी चुनावों के बाद बदलते राजनीतिक समीकरणों ने इजरायल के नेताओं के बीच भी नई बहस छेड़ दी है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका में ट्रंप की राजनीतिक चुनौतियां नेतन्याहू के लिए भी मुश्किलें बढ़ा सकती हैं? और क्या इजरायल में प्रधानमंत्री पद की अगली दौड़ में अमेरिकी राजनीति एक निर्णायक मुद्दा बनने जा रही है? अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को हुए मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने सीनेट और प्रतिनिधि सभा दोनों में बहुमत हासिल किया। यह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। इस चुनाव में ईरान के साथ युद्ध और इजरायल को अमेरिकी समर्थन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। कई डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों ने इजरायल को दी जाने वाली अमेरिकी सैन्य सहायता और ट्रंप प्रशासन की मध्य पूर्व नीति की आलोचना की थी। चुनाव परिणाम आने के बाद इजरायल के विपक्षी नेताओं ने इसे नेतन्याहू की विदेश नीति की विफलता से जोड़ना शुरू कर दिया। उनका आरोप है कि नेतन्याहू ने अमेरिका में दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने के बजाय रिपब्लिकन पार्टी और ट्रंप पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया। इसका नतीजा यह हुआ कि इजरायल के प्रति अमेरिकी समर्थन अब पहले की तरह द्विदलीय (Bipartisan) नहीं रह गया है। इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्षी नेता यायर लैपिड ने अमेरिकी चुनाव परिणामों को नेतन्याहू की नेतृत्व शैली के खिलाफ संकेत बताया। लैपिड का कहना है कि इजरायल अब नेतन्याहू को प्रधानमंत्री पद पर बनाए रखने का जोखिम नहीं उठा सकता। उनके अनुसार, मौजूदा सरकार की नीतियां देश की सुरक्षा, लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित कर रही हैं। वहीं, विपक्षी नेता यायर गोलान ने आरोप लगाया कि नेतन्याहू की वजह से इजरायल अमेरिका में डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों के बीच अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता खो रहा है। गोलान ने चेतावनी दी कि नेतन्याहू और कट्टर दक्षिणपंथी मंत्री इतामार बेन-ग्विर की सत्ता में निरंतरता से इजरायल को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, वैश्विक अलगाव और अमेरिका के साथ टकराव का सामना करना पड़ सकता है। ये विपक्षी नेताओं के राजनीतिक आरोप हैं। इजरायल के विपक्षी नेता एविगडोर लिबरमैन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू के संबंधों पर सवाल उठाए हैं। लिबरमैन ने सोशल मीडिया पर आरोप लगाया कि ट्रंप द्वारा नेतन्याहू को समर्थन देने की राजनीतिक कीमत 3.8 अरब डॉलर सालाना अमेरिकी सैन्य सहायता हो सकती है। दरअसल, ट्रंप ने अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के दिन इजरायल को दी जाने वाली लगभग 3.8 अरब डॉलर की वार्षिक सैन्य सहायता समाप्त करने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि इससे डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को मिलने वाला एक राजनीतिक मुद्दा खत्म हो जाएगा। लिबरमैन का कहना है कि यदि अमेरिका अपनी सैन्य सहायता बंद करता है, तो इजरायल को रक्षा बजट बढ़ाना पड़ सकता है। इसका आर्थिक बोझ अंततः आम नागरिकों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, ट्रंप की घोषणा और सहायता समाप्त करने के वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अंतर है। इस फैसले के भविष्य और उसकी शर्तों को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को हुए संसदीय चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद की लड़ाई और दिलचस्प हो गई है। पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरे हैं। चुनाव में नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को 120 सदस्यीय नेसेट में 53 सीटें मिलीं, जबकि आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें हासिल हुईं। बहुमत के लिए 61 सीटों की जरूरत है। वहीं, अरब नेतृत्व वाली दो पार्टियों यूनाइटेड अरब लिस्ट (राआम) और ज्वाइंट लिस्ट को कुल 19 सीटें मिली हैं। इन दोनों दलों ने आइजेनकोट को प्रधानमंत्री बनाने के लिए समर्थन देने की बात कही है। इस तरह सरकार बनाने के लिए आवश्यक संख्या जुटाने में विपक्ष को संभावित बढ़त मिलती दिखाई दे रही है, हालांकि गठबंधन का अंतिम स्वरूप अभी तय नहीं है। नेतन्याहू की मुश्किलें केवल विपक्ष तक सीमित नहीं हैं। उनकी लंबे समय से सहयोगी रही अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स पार्टी यूनाइटेड टोरा जूडिज्म (UTJ) ने भी इस बार किसी उम्मीदवार को सरकार बनाने के लिए समर्थन देने की सिफारिश नहीं की। 2009 के बाद यह पहला मौका बताया जा रहा है, जब पार्टी ने नेतन्याहू या किसी अन्य नेता के नाम की सिफारिश करने से परहेज किया है। इस घटनाक्रम से नेतन्याहू के गठबंधन की स्थिति कमजोर हुई है और आइजेनकोट के लिए सरकार बनाने का रास्ता कुछ आसान हुआ है। 6 नवंबर 2026 की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल के पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट प्रधानमंत्री पद की दौड़ में आगे निकलते दिखाई दे रहे हैं। राष्ट्रपति इसाक हर्जोग के सामने छह संसदीय दलों ने कुल 67 सांसदों के समर्थन के साथ आइजेनकोट का नाम प्रस्तावित किया है। वहीं, नेतन्याहू के समर्थन में 46 सांसदों की सिफारिश सामने आई है। राष्ट्रपति हर्जोग को अब यह तय करना है कि सरकार बनाने के लिए किस नेता को आमंत्रित किया जाए। चुने गए उम्मीदवार को गठबंधन तैयार करने के लिए 28 दिन मिलेंगे, जिसे जरूरत पड़ने पर 42 दिन तक बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, आइजेनकोट के सामने भी चुनौतियां हैं। उन्हें अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स दलों या अरब पार्टियों के समर्थन के सहारे बहुमत जुटाना होगा। इस मुद्दे पर उनके संभावित सहयोगियों के बीच मतभेद भी हैं। इजरायल में सत्ता परिवर्तन की संभावना के बीच एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या नया प्रधानमंत्री अमेरिका के साथ पुराने संबंध बहाल कर पाएगा? अमेरिका में इजरायल के प्रति नकारात्मक जनमत केवल नेतन्याहू तक सीमित नहीं है। मैरीलैंड विश्वविद्यालय के राजनीतिक विश्लेषक शिबली तेलहामी के अनुसार, अप्रैल में किए गए एक सर्वेक्षण में कई अमेरिकी नागरिकों का इजरायल के प्रति नजरिया नेतन्याहू के प्रति नजरिये जितना ही नकारात्मक था। उनका मानना है कि नेतन्याहू की जगह कोई दूसरा नेता आने से भी अमेरिका में इजरायल की छवि तुरंत पहले जैसी नहीं हो जाएगी। इसका अर्थ है कि इजरायल के अगले प्रधानमंत्री के सामने केवल सरकार बनाने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि अमेरिका के भीतर बदलती राजनीतिक और जनभावनाओं के बीच संबंधों को संभालना भी महत्वपूर्ण होगा। अमेरिका दशकों से इजरायल का सबसे महत्वपूर्ण सैन्य और कूटनीतिक सहयोगी रहा है। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, हथियारों की आपूर्ति और खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान का लंबा इतिहास है। लेकिन गाजा युद्ध, ईरान के साथ सैन्य संघर्ष और इजरायल की मौजूदा सरकार की नीतियों ने अमेरिकी राजनीति में इस रिश्ते को विवाद का विषय बना दिया है। अमेरिका की नई डेमोक्रेटिक बहुमत वाली संसद सुनवाई, सरकारी निगरानी और बजट संबंधी फैसलों के जरिए इजरायल को मिलने वाली सहायता पर दबाव बना सकती है। हालांकि, अमेरिकी विदेश नीति में राष्ट्रपति की भूमिका अभी भी बेहद महत्वपूर्ण है। अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार ने इजरायल की राजनीति में एक नया मुद्दा खड़ा कर दिया है। नेतन्याहू के विरोधी इसे उनकी विदेश नीति और ट्रंप पर अत्यधिक निर्भरता का परिणाम बता रहे हैं। दूसरी ओर, गादी आइजेनकोट के सामने सरकार बनाने और देश के भीतर राजनीतिक एकता स्थापित करने की चुनौती है। अब पूरी दुनिया की नजर इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग के फैसले और आगामी गठबंधन वार्ताओं पर है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो सकता है कि इजरायल में नेतन्याहू की सत्ता बरकरार रहती है या देश को नया प्रधानमंत्री मिलता है।अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार ने बदला इजरायल का राजनीतिक समीकरण
नेतन्याहू पर विपक्ष का हमला: अमेरिका से रिश्ते कमजोर करने का आरोप
ट्रंप के समर्थन की कीमत 3.8 अरब डॉलर? लिबरमैन का बड़ा दावा
गादी आइजेनकोट बने नेतन्याहू के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी
नेतन्याहू के पुराने सहयोगी भी छोड़ रहे हैं साथ
आइजेनकोट को मिला 67 सांसदों का समर्थन
क्या नेतन्याहू की जगह नया प्रधानमंत्री अमेरिका से रिश्ते सुधार पाएगा?
अमेरिका-इजरायल संबंधों पर क्यों पड़ सकता है दूरगामी असर?
निष्कर्ष: नेतन्याहू के लिए दोहरी चुनौती















