अधिकारियों के तबादले पर हाईकोर्ट में चुनौती, चुनाव आयोग पर “अप्रत्याशित आपातकाल” लगाने का आरोप
कोलकाता, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की घोषणा के बाद प्रशासनिक फेरबदल को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस के सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने सोमवार को कोलकाता उच्च न्यायालय में चुनाव आयोग के फैसलों को चुनौती दी।
मुख्य न्यायाधीश सुजय पाल और न्यायमूर्ति पार्थसारथी सेन की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान कल्याण बनर्जी ने आरोप लगाया कि आयोग ने बिना अनुच्छेद 356 लागू किए राज्य में “अप्रत्याशित आपातकाल” जैसी स्थिति पैदा कर दी है।
उन्होंने दलील दी कि रातों-रात कई वरिष्ठ अधिकारियों को हटा दिया गया, जिनमें मुख्य सचिव और पुलिस आयुक्त जैसे पद शामिल हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जिन अधिकारियों का सीधे चुनाव से संबंध नहीं है, उन्हें हटाने का क्या औचित्य है।
अदालत में पेश आंकड़ों के अनुसार, अब तक 16 आईएएस और 63 पुलिस अधिकारियों का तबादला किया गया है। बनर्जी ने कहा कि यदि राज्य में कोई आपात स्थिति उत्पन्न होती है, तो इस प्रशासनिक शून्यता को कौन संभालेगा।
राज्य के महाधिवक्ता किशोर दत्त ने भी आयोग की शक्तियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव आयोग का दायरा मुख्य रूप से मतदाता सूची और चुनाव संचालन तक सीमित है, ऐसे में गैर-चुनावी अधिकारियों के तबादले का अधिकार किस हद तक है, यह स्पष्ट होना चाहिए।
वहीं, चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील ने याचिकाकर्ता के अधिकार पर ही सवाल खड़ा किया। उनका तर्क था कि एक सरकारी पैनल से जुड़े अधिवक्ता द्वारा जनहित याचिका दायर करना उचित नहीं है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए आवश्यकतानुसार ऐसे कदम उठाए जाते हैं और अन्य राज्यों में भी अधिकारियों का तबादला किया गया है।
मामले की सुनवाई के बाद भी विवाद थमा नहीं है। अदालत ने अगली सुनवाई बुधवार दोपहर के लिए निर्धारित की है।
अब राजनीतिक हलकों की नजर इस बात पर है कि नवान्न और चुनाव आयोग के बीच यह टकराव आगे किस दिशा में जाता है।















