अमेरिकी टैरिफ से भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा और निर्यात की दोहरी चुनौती डाॅ. अरविंद नाथ तिवारी
सितंबर 2026 में अमेरिकी कांग्रेस से पारित कानून के तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से महत्वपूर्ण मात्रा में ऊर्जा खरीदने वाले देशों के अमेरिकी निर्यात पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का अधिकार दिया गया है। भारत, चीन और तुर्की जैसे देश इस प्रावधान के संभावित दायरे में हैं, यदि इसका इस्तेमाल ट्रंप भारत के खिलाफ करते हैं तो इसका सीधा असर भारत के अमेरिकी बाजार में निर्यात पर पड़ेगा।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया है कि भारत के लिए रूसी तेल को अचानक छोड़ देना आसान नहीं है। उन्होंने इसे 1.4 अरब भारतीयों की ऊर्जा जरूरतों से जुड़ा विषय बताया है।
भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती
भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में शामिल है और घरेलू अर्थव्यवस्था की गति के लिए सस्ता तथा स्थिर ऊर्जा आपूर्ति महत्वपूर्ण है। रूसी कच्चे तेल ने पिछले वर्षों में भारतीय रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण स्रोत का रूप लिया है। भारतीय तेल कंपनियों के अधिकारियों ने भी संकेत दिया है कि मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों में रूसी तेल को तुरंत दूसरे स्रोतों से पूरी तरह बदलना कठिन हो सकता है, यदि भारत रूसी तेल की खरीद अचानक बंद करता है तो उसे मध्य-पूर्व, अमेरिका और अन्य उत्पादक देशों से अतिरिक्त तेल खरीदना पड़ेगा। इसका असर केवल सरकार के आयात बिल पर नहीं बल्कि पेट्रोल-डीजल, परिवहन, माल ढुलाई और अंततः रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
अमेरिकी बाजार का महत्व
भारत के लिए अमेरिका केवल एक राजनीतिक साझेदार नहीं बल्कि अत्यंत महत्वपूर्ण व्यापारिक बाजार भी है। अमेरिकी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार साल 2025 में अमेरिका और भारत के बीच वस्तुओं एवं सेवाओं का कुल व्यापार लगभग 239.6 अरब डॉलर रहा। इसमें अमेरिकी आयात के रूप में भारत से करीब 103.8 अरब डॉलर की वस्तुएं और 47.6 अरब डॉलर की सेवाएं शामिल थीं। इसलिए 100 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क का सवाल केवल सीमा शुल्क तक सीमित नहीं रहेगा। यदि ऐसा शुल्क व्यापक रूप से लागू होता है तो अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की कीमत बढ़ सकती है और उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता घट सकती है। इससे कपड़ा, दवा, इंजीनियरिंग सामान, आभूषण, रसायन, मशीनरी तथा अन्य निर्यात क्षेत्रों पर दबाव पड़ सकता है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर भी असर
सबसे बड़ी चिंता भारत-अमेरिका के व्यापक व्यापारिक संबंधों को लेकर है। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चलती रही है, ऐसे समय में रूसी तेल का मुद्दा व्यापार वार्ता के साथ जुड़ना परिस्थितियों को और जटिल बनाता है। भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि सरकार अमेरिकी कानून के प्रावधानों का अध्ययन कर रही है। अमेरिकी दबाव भारत को ऊर्जा नीति और व्यापार नीति के बीच कठिन संतुलन बनाने के लिए मजबूर कर सकता है। एक तरफ भारत को सस्ती और विश्वसनीय ऊर्जा चाहिए, दूसरी तरफ अमेरिका भारत के लिए बड़ा निर्यात बाजार है, ऐसे में किसी एक विकल्प को चुनने की कीमत दूसरे क्षेत्र में चुकानी पड़ सकती है।
क्या भारत के पास विकल्प हैं?
भारत के लिए रास्ता केवल रूसी तेल छोड़ना या अमेरिका से टकराव मोल लेना नहीं है। भारत विभिन्न देशों से तेल खरीद की संभावनाएं तलाशता रहा है। साथ ही, अमेरिकी कानून में राष्ट्रपति को अधिकार मिलना और उसका वास्तव में भारत पर इस्तेमाल किया जाना दो अलग-अलग बातें हैं, इसलिए कूटनीतिक बातचीत, संभावित छूट, सीमा-शुल्क में अपवाद और व्यापार समझौते के रास्ते खुले रह सकते हैं। अमेरिकी कानून के समर्थक रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने को आवश्यक मानते हैं, जबकि आलोचकों का तर्क है कि व्यापक शुल्क अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं के लिए भी लागत बढ़ा सकते हैं।
आज भारत के सामने प्रश्न केवल यह नहीं है कि रूस से तेल खरीदा जाय या नहीं। असली प्रश्न यह है कि ऊर्जा सुरक्षा, महँगाई, निर्यात और रणनीतिक स्वायत्तता- इन चारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाय
रूस से तेल खरीदना जारी रखने पर अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात पर संभावित दबाव भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है। वहीं, अचानक रूसी तेल छोड़ने पर वैश्विक तेल कीमतों और घरेलू ऊर्जा लागत पर दबाव पड़ने का जोखिम है। इसलिए आने वाले समय में भारत की नीति का केंद्र तेल की आपूर्ति के विविधीकरण, अमेरिकी बाजार को सुरक्षित रखने और रूस के साथ ऊर्जा संबंधों को व्यावहारिक ढंग से संभालने पर रहेगा।















