पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर, कच्चे तेल कीमतों में उबाल, 119 डॉलर तक पहुंचा ब्रेंट क्रूड
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दिल्ली, पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव का असर अब कच्चे
तेल (क्रूड ऑयल) के भाव में आए उछाल के रूप में साफ-साफ नजर आने लगा है। इस
तनाव के शुरू होने के बाद से ही स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के रास्ते कच्चे तेल
की सप्लाई ठप हो जाने तथा कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे प्रमुख
तेल उत्पादक देशों द्वारा कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती कर देने की वजह
से इसके भाव आसमान पर पहुंच गए हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में फिलहाल
क्रूड ऑयल 110 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है। पिछले सात दिन
के दौरान क्रूड के भाव में 55 प्रतिशत से अधिक की तेजी आई है। इस तेजी के
कारण ब्रेंट क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है, जबकि
वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड भी 113 डॉलर प्रति बैरल के
स्तर के ऊपर पहुंचा हुआ है। आज ब्रेंट क्रूड ने 107.92 डॉलर प्रति बैरल के
स्तर से कारोबार की शुरुआत की और थोड़ी ही देर में उछल कर 119.14 डॉलर
प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। इसके बाद इसकी कीमत में मामूली गिरावट का
रुख भी बना। भारतीय समय के मुताबिक सुबह 11 बजे ब्रेंट क्रूड 22.88 डॉलर
प्रति बैरल यानी 24.69 प्रतिशत की तेजी के साथ 115.57 डॉलर प्रति बैरल के
भाव पर कारोबार कर रहा था।
इसी तरह वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट
(डब्ल्यूटीआई) क्रूड ने आज 107.81 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से कारोबार की
शुरुआत की और थोड़ी ही देर में उछल कर 119.48 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर
पहुंच गया। हालांकि बाद में इसके भाव में गिरावट भी आई, जिसके कारण भारतीय
समय के अनुसार सुबह 11 बजे वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड
22.75 डॉलर प्रति बैरल यानी 25.02 प्रतिशत की उछाल के साथ 113.65 डॉलर
प्रति बैरल के भाव पर कारोबार कर रहा था। हाजिर सौदों के अलावा ब्रेंट
क्रूड फ्यूचर्स 22 प्रतिशत उछल कर 115 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार
कर रहा है, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड फ्यूचर्स 27
प्रतिशत की विशाल के साथ 115.21 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंचा हुआ
है।
दरअसल पश्चिम एशिया में तनाव शुरू होने के बाद ऑर्गेनाइजेशन ऑफ
पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक प्लस) में शामिल इराक ने अपने तीन
बड़े दक्षिणी ऑयल फील्ड्स से होने वाले प्रोडक्शन में लगभग 70 प्रतिशत की
कटौती कर दी है। इस कटौती के बाद इन तीनों ऑयल फील्ड्स से रोजाना 43 लाख
बैरल कच्चे तेल का उत्पादन होने की जगह अब सिर्फ 13 लाख बैरल कच्चे तेल का
उत्पादन किया जा रहा है। इसी तरह कुवैत ने भी कच्चे तेल के उत्पादन में
कटौती करने का ऐलान किया है। हालांकि कुवैत द्वारा कच्चे तेल के उत्पादन
में कितनी कटौती की जाएगी, इसकी जानकारी अभी नहीं दी गई है।
मार्केट
एक्सपर्ट्स के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में आई तेजी की एक बड़ी वजह ऑयल
इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार हो रहे हमले भी हैं। अमेरिका और इजराइल ने जहां
ईरान के तेल ठिकानों को निशाना बनाया है, वहीं ईरान भी पश्चिम एशिया में
अमेरिका के सहयोगी देश के ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रहा है।
अमेरिका और इजराइली सेना ने तेहरान में ऑयल डिपो, ऑयल स्टोरेज टैंकर्स और
पेट्रोलियम ट्रांसफर टर्मिनल को अपना निशाना बनाया। इसके बाद ईरान ने भी
जवाबी कार्रवाई करते हुए संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और बहरीन के तेल
ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल से हमले किए।
ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर पर
हमला होने की वजह से भी मिडिल ईस्ट के तेल उत्पादक देशों पर दबाव बढ़ गया
है, जिसका असर कच्चे तेल की कीमत मे आए उछाल के रूप में नजर आ रहा है।
माना जा रहा है कि पश्चिम एशिया के सैन्य तनाव की वजह से कच्चे तेल की
आपूर्ति लंबे समय तक प्रभावित रह सकती है। ऐसा होने पर तेल के आयात पर
निर्भर करने वाले भारत जैसे कई एशियाई देशों पर असर पड़ने लगा है।
भारत
अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीदता है।
इसी तरह जापान भी अपनी पेट्रोलियम की जरूरत को पूरा करने के लिए आयात पर
निर्भर करता है। इसमें भी 90 प्रतिशत कच्चा तेल वो मिडिल ईस्ट के देशों से
ही खरीदता है। इसके अलावा चीन ने भी पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत को
नियंत्रित रखने के लिए कच्चे तेल के निर्यात को कम कर दिया है।
जहां
तक भारत की बात है, तो कच्चे तेल की कीमत के 110 डॉलर से ऊपर चले जाने के
कारण देश के इंपोर्ट बिल में जबरदस्त इजाफा होने की आशंका बन गई है। इसी
तरह देश की ऑयल इकोनॉमी पर भी नकारात्मक असर पड़ने लगा है। हालांकि भारत
सरकार के दावे के मुताबिक देश में पेट्रोलियम उत्पादों का पर्याप्त भंडार
है, लेकिन अगर कच्चे तेल की कीमत पर जल्दी ही लगाम नहीं लगा, तो भारत में
भी पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत में इजाफा हो सकता
है। इसके साथ ही महंगे क्रूड को खरीदने के कारण भारत को तुलनात्मक तौर पर
अधिक डॉलर खर्च करना पड़ेगा, जिससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी असर
पड़ेगा और राजकोषीय घाटे पर भी दबाव पढ़ने की आशंका बनेगी।















