फिल्म अस्सी की समीक्षा: जब हर 20 मिनट पर झकझोरती है स्क्रीन और आईना बन जाता है सिनेमा
फिल्म: अस्सी (2026)
निर्देशक: अनुभव सिन्हा
कलाकार: तापसी पन्नू, कानि कुश्रुति, रेवती, मनोज पाहवा, कुमुद मिश्रा, मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब, नसीरुद्दीन शाह, सुप्रिया पाठक, सीमा पाहवा, अद्विक जायसवाल
रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐/5
हम अक्सर खबरों को स्क्रोल करके आगे बढ़ जाते हैं। एक और अपराध, एक और हेडलाइन, एक और बहस। लेकिन क्या होता है उस एक 'हेडलाइन' के बाद? अस्सी उसी अनकहे हिस्से को सामने लाती है, जहां आंकड़े इंसान बनते हैं और इंसान जख्म। भारत में यौन अपराधों के आंकड़े सिर्फ सरकारी फाइलों में दर्ज संख्या नहीं हैं,
कहानी
कहानी परिमा (कानी कुस्रुति) की है, एक साधारण टीचर, जो अपने पति विनय (मोहम्मद जीशान अय्यूब) और बेटे ध्रुव (अद्विक में जायसवाल) के साथ दिल्ली में एक सादा और खुशहाल जीवन जी रही है। एक रात, घर लौटते वक्त उसकी दुनिया बिखर जाती है। पांच लोग उसे अगवा कर सामूहिक दुष्कर्म करते हैं और अधमरी हालत में छोड़ देते हैं।
कैसी है फिल्म?
'अस्सी' मनोरंजन के लिए नहीं बनी। यह आपको असहज करती है, झकझोरती है और कई बार चुप कर देती है। फिल्म का ट्रीटमेंट बेहद रॉ है। अनुभव सिन्हा किसी भी सीन को ग्लैमरस या सिनेमाई प्रभाव के लिए मुलायम नहीं बनाते। हर 20 मिनट में स्क्रीन पर उभरती स्लेट एक सख्त याद दिलाती है कि अपराध सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं, वह आज की सच्चाई है। बीच-बीच में फिल्म की रफ्तार थोड़ी धीमी होती है और 'छतरी मैन' जैसा सब-प्लॉट हल्का भटकाव देता है, लेकिन मूल कथा की ताकत बनी रहती है।
निर्देशन और लेखन
फिल्म के लेखक गौरव सोलंकी ने संवादों में आक्रोश को शोर नहीं बनने दिया। शब्द शांत हैं, लेकिन असर गहरा है। कोर्टरूम को यहां नाटकीय तमाशा नहीं बनाया गया। बहसें वास्तविक हैं, जज की सख्ती असली लगती है और प्रक्रिया का बोझ महसूस होता है। यही फिल्म की विश्वसनीयता है। अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी की जोड़ी ने बिना किसी लाग-लपेट के सच्चाई को सामने रखा है, और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
अभिनय
कानी कुस्रुति इस फिल्म की धड़कन हैं। उनके चेहरे की खामोशी और आंखों का खालीपन शब्दों से कहीं ज्यादा बोलता है। वे परिमा को निभाती नहीं जीती हैं। तापसी पन्नू एक सधे हुए, दृढ़ और आत्मविश्वासी वकील के रूप में नजर आती हैं। उनका प्रदर्शन संयमित है,
संगीत
फिल्म में गानों की जगह खामोशी ज्यादा बोलती है। रंजीत बरोट का बैकग्राउंड स्कोर दृश्यों की बेचैनी को बढ़ाता है। यह संगीत मनोरंजन नहीं, बल्कि माहौल की तीव्रता को गहरा करने का माध्यम बनता है।
देखें या नहीं?
अगर आप सिनेमा को सिर्फ टाइमपास नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप मानते हैं, तो 'अस्सी' जरूर देखें। लेकिन अगर आप हल्का-फुल्का मनोरंजन चाहते हैं, तो यह फिल्म आपको असहज कर सकती है। यह फिल्म सवाल पूछती है, जवाब नहीं देती।
'अस्सी' एक फिल्म कम, एक अनुभव ज्यादा है। यह आपको सोचने पर मजबूर करती है कि प्रगति और विकास के दावों के बीच महिला सुरक्षा आज भी सबसे बड़ा सवाल क्यों है। सिनेमाघर की लाइट जलने के बाद भी यह फिल्म आपके भीतर चलती रहती है। और शायद यही इसकी सबसे बड़ी कामयाबी है।















