गुलबहार सिंह निर्देशित फिल्म प्रेमचंद : एक जीवन में कालजयी लेखक की जीवन यात्रा का मार्मिक चित्रण
कोलकाता, भारतीय साहित्य के अप्रतिम साहित्यकार उपन्यास सम्राट
प्रेमचंद की 146वीं जयंती पर कोलकाता के नेशनल लाइब्रेरी स्थित भाषा भवन
के सेमिनार हॉल में निर्देशक गुलबहार सिंह द्वारा दूरदर्शन के लिए बनाई गई
'प्रेमचंद: एक जीवन' फिल्म का प्रदर्शन हुआ। इस फिल्म के जरिए प्रेमचंद के
संघर्ष और विचारों को जिस तरीके से अपने निर्देशन में गुलबहार सिंह ने
दर्शकों के सामने रखा वह अविस्मरणीय है।
रशिद इकबाल की पटकथा पर
बनी यह फिल्म के चार भागों में विभक्त है। इतनी लंबी फिल्म अपनी पटकथा,
निर्देशन और योग्य कलाकारों की वजह से तनिक भी बोझिल नहीं लगी। गुलबहार ने
उन सभी स्थान और घरों को पर्दे पर दर्शकों के सामने लेकर आये जहां प्रेमचंद
कभी रहे थे या वहां से उनके संबंध थे।
प्रख्यात अभिनेता इरफ़ान
खान ने इसमें प्रेमचंद का किरदार निभाया था और अपनी अदाकारी से उन्होंने
प्रेमचंद के किरदार को जीवंत कर दिया था। इसके अलावा टॉम अल्टर की इस
फिल्म में एक ख़ास भूमिका थी। आज यह दोनों ही कलाकार हमारे बीच नहीं रहे।
इस फिल्म की खास बात यह भी थी कि इसमें अधिकतर कलाकार मसलन संजीव शुक्ला,
अशोक मेहरा, सुधीर निगम, मंजुला सिंह, पुण्य दर्शन गुप्ता, प्रेम मोदी,
कृष्ण कुमार पार्थ तथा कई अन्य कलाकार कलकत्ते से ही जुड़े थे और कुछ तो
स्वयं उपस्थित भी थे। आकाशवाणी से जुड़े प्रीतम खन्ना की गम्भीर आवाज़ ने तो
इस फिल्म को सूत्रधार के तौर पर एक अलग ही मुकाम दे दिया था।
अपने
शब्दों से समाज को आईना दिखाने वाले और साहित्य को राजनीति की मशाल कहने
वाले प्रेमचंद का जीवन कितना चुनौतीपूर्ण रहा, यह इस फ़िल्म के माध्यम से
देखा जा सकता है। प्रेमचंद के बचपन से लेकर मृत्यु पर्यन्त जीवन के
प्रत्येक पड़ाव को जिस जीवंतता से दर्शकों के सामने लाया गया वह अविस्मरणीय
था । एक व्यक्ति की वैचारिक पृष्ठभूमि कैसे विकसित होती है और कैसे वह
अपने विचारों को अपनी कलम के माध्यम से समाज की सोचने की क्षमता को
प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल करता है, कैसे कुरीतियों पर कुठाराघात कर
उसे सबके सामने लाने की जिद्द में कई यातनाएँ सहता है - फ़िल्म के माध्यम
से प्रेमचंद के जीवन का यह पहलू काफी प्रभावशाली तरीके से दर्शकों के समक्ष
रखा गया है।
लेकिन यह बड़े दुःख की बात है कि इतने मेहनत, शोध और
एक चुनौतिपूर्ण माहौल में बनी ऐतिहासिक फ़िल्म अब आम दर्शकों की पहुंच से
बाहर है। इतने महत्वपूर्ण साहित्यकार की जीवनी जिसमें इतने महान कलाकारों
ने काम किया है उसे दूरदर्शन सहित किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्शक देख
नहीं सकते। आज के समय में जब फिल्मों का उपयोग जनता के बीच नफरत के बीज
बोने में हो रहा है यह फिल्म अपने आप में एक मिसाल है कि भाषा और धर्म कभी
भी भारत के जनमानस में नफरत का आधार नहीं रहे है। आज के समय में यह फिल्म
प्रत्येक स्कूलों में दिखाने की व्यवस्था होनी चाहिए थी। पर यह एक विडम्बना
ही है कि जिस फिल्म तक जन-जन की पहुँच होनी चाहिए थी वो दूरदर्शन के किसी
भी प्लेटफॉर्म में उपलब्ध नहीं है। निर्देशक गुलबहार सिंह के अनुसार
उन्होंने कई बार दूरदर्शन के अधिकारियों को इस बारे में अनुरोध किए, सुझाव
भेजे, ई-मेल भेजे लेकिन दूरदर्शन के तरफ से कोई जवाब नहीं आया।















