पिछले 12 वर्षों में लोकतंत्र और संस्थाओं को भारी नुकसान पहुंचा, सुधार में लगेगा समय : सोनिया गांधी
नई दिल्ली, कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि पिछले 12 वर्षों में देश के लोकतांत्रिक ढांचे, संस्थाओं और सामाजिक ताने-बाने को भारी नुकसान पहुंचा है। उन्होंने कहा कि केंद्र की मौजूदा सरकार के जाने के बाद भी लोकतांत्रिक व्यवस्था और संस्थाओं को फिर से मजबूत करने में समय लगेगा। इसके लिए राजनीतिक दलों को गंभीरता से सामूहिक प्रयास करने होंगे।
सोनिया गांधी ने अपनी आने वाली पुस्तक ‘बिलॉन्गिंग : अ जर्नी ऑफ लव’ के प्रकाशन से पहले एक अंग्रेजी अखबार को दिए साक्षात्कार में यह बातें कहीं। हार्परकॉलिन्स इंडिया से प्रकाशित होने वाली यह पुस्तक 10 नवंबर को बाजार में आएगी और 16 नवंबर को आधिकारिक लोकार्पण किया जाएगा। इस किताब में उन्होंने अपने निजी जीवन, भारत से जुड़ाव, राजनीतिक सफर, कांग्रेस की भूमिका और देश के मौजूदा राजनीतिक हालात पर विचार रखे हैं। उन्होंने कहा कि अब लोगों को देश की संस्थाओं और लोकतांत्रिक व्यवस्था को हुए नुकसान का एहसास होने लगा है। इसके बावजूद वह देश के भविष्य को लेकर आशावादी हैं।
कांग्रेस की मौजूदा स्थिति और चुनावी संभावनाओं पर सोनिया गांधी ने कहा कि वह पार्टी की स्थिति को लेकर निराशावादी नहीं हैं। केंद्र में मौजूदा सरकार के आने के बाद से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को समान अवसर नहीं मिले हैं। सरकार का सभी संस्थाओं, खासकर चुनाव आयोग पर पूरा नियंत्रण है। मुख्यधारा का मीडिया भी उसके प्रभाव में है। इसके अलावा धनबल और धर्म के इस्तेमाल से राजनीतिक मुकाबले को प्रभावित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि तमाम चुनौतियों और उत्पीड़न के बावजूद कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता गांवों तथा जिलों में संविधान के मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हाल के महीनों में कई चुनावों में गड़बड़ी और चुनाव चोरी के मामले सामने आए हैं तथा अब लोग भी इस मुद्दे को लेकर जागरूक हो रहे हैं। कांग्रेस समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर काम कर रही है और उसकी संभावनाएं दिन-ब-दिन बेहतर हो रही हैं।
सोनिया गांधी ने तत्कालीन कांग्रेस नेताओं शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर की ओर से 1999 में उनके विदेशी मूल का मुद्दा उठाए जाने पर भी बात की। उनसे पूछा गया कि क्या इस घटना ने प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं करने के उनके फैसले को और मजबूत किया था। इस पर उन्होंने कहा कि उन्हें अपने साथियों के इस रुख से गहरा दुख पहुंचा था। उन्हें लगता था कि उन नेताओं को उन पर भरोसा है लेकिन बाद में पता चला कि ऐसा नहीं था। यह जानकर उन्हें धक्का लगा कि वे उन्हें अब भी बाहरी मानते थे। उस समय उनकी आंखों में आंसू आ गए थे और वह बैठक से बाहर चली गई थीं। उन्हें किसी पद या सत्ता से वंचित रहने का दुख नहीं था बल्कि भारत के प्रति उनकी निष्ठा पर सवाल उठाए जाने से पीड़ा हुई थी।
भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ राजनीतिक समझौते के सवाल पर सोनिया गांधी ने कहा कि कांग्रेस ने कभी इनके साथ समझौता नहीं किया और भविष्य में भी ऐसा नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि राजनीति में कभी-कभी अलग विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन करना पड़ता है, लेकिन भाजपा और आरएसएस के साथ समझौता संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की आधिकारिक विचारधारा सभी नागरिकों को बिना किसी डर के अपने धर्म और विश्वास का पालन करने के संवैधानिक अधिकार के समर्थन में है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक उदय से कांग्रेस को सीख लेने के सवाल पर सोनिया गांधी ने कहा कि मोदी अलग वैचारिक पृष्ठभूमि से आते हैं लेकिन कांग्रेस में भी राजनीतिक सफलता के कई उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि आरएसएस से सीखने के लिए कांग्रेस के पास बहुत कुछ नहीं है।
सोनिया गांधी ने आपातकाल को स्वतंत्र भारत के इतिहास का काला अध्याय बताया। उन्होंने कहा कि उस दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर रोक लगाई गई थी और बंदी प्रत्यक्षीकरण का अधिकार भी निलंबित कर दिया गया था। बाद में इंदिरा गांधी ने हालात को समझते हुए मार्च 1977 में चुनाव कराने का फैसला किया और आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों पर खेद जताते हुए माफी भी मांगी थी।














