आम आदमी पार्टी (AAP) इस समय राष्ट्रीय राजनीति और अपने सबसे महत्वपूर्ण राज्य पंजाब—दोनों मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रही है। विपक्षी INDIA गठबंधन के साथ उसके रिश्तों में आई दूरी और पंजाब की राजनीति में बदलते समीकरणों ने पार्टी के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। दिल्ली की सत्ता से बाहर होने के बाद पार्टी के लिए पंजाब में अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखना और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान कायम करना अहम हो गया है।

INDIA गठबंधन से अलग राह पर AAP

विपक्षी INDIA गठबंधन से आम आदमी पार्टी की दूरी अब खुलकर सामने आ चुकी है। जून 2026 में AAP ने स्पष्ट कर दिया था कि वह अब इस गठबंधन का हिस्सा नहीं है। पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा था कि AAP गठबंधन की बैठकों में शामिल नहीं होगी, क्योंकि वह अब इसका हिस्सा नहीं है। पार्टी की मुख्य प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने कांग्रेस के साथ भविष्य में गठबंधन की संभावना से भी इनकार किया था।

The Economic Times

इस अलगाव का एक बड़ा राजनीतिक पहलू पंजाब है। 2024 के लोकसभा चुनाव में AAP और कांग्रेस ने INDIA गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद पंजाब की सभी 13 सीटों पर अलग-अलग चुनाव लड़ा था। ऐसे में दोनों दलों के बीच राज्य में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले से ही बनी हुई थी। अब राष्ट्रीय स्तर पर भी गठबंधन से दूरी ने विपक्षी राजनीति में AAP की स्थिति को अलग कर दिया है।

India Today

पंजाब में तीन विधायकों के पार्टी छोड़ने से बढ़ी मुश्किल

पंजाब में AAP की सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर उभरता असंतोष है। नवंबर की शुरुआत में पार्टी को उस समय झटका लगा, जब उसके तीन विधायकों ने पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया।

इनमें हरमीत सिंह पठानमाजरा, चेतन सिंह जौरामाजरा और पूर्व IPS अधिकारी कुँवर विजय प्रताप सिंह शामिल हैं। पठानमाजरा सनौर, जौरामाजरा समाना और कुँवर विजय प्रताप सिंह अमृतसर नॉर्थ विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। तीनों नेताओं ने 2 नवंबर को दिल्ली में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की।

Outlook India+1

पार्टी छोड़ने वाले नेताओं ने भगवंत मान सरकार के कामकाज, चुनावी वादों के क्रियान्वयन, कानून-व्यवस्था, नशे की समस्या और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए। उन्होंने किसानों, सरकारी कर्मचारियों और शिक्षा-स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को भी उठाया। हालांकि, ये आरोप और दावे संबंधित नेताओं के बयान हैं; सरकार और AAP नेतृत्व का पक्ष भी इस राजनीतिक विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

Outlook India

टिकट बंटवारे ने भी बढ़ाई नाराजगी

विधायकों के इस्तीफे का घटनाक्रम 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच सामने आया। AAP ने चुनाव के लिए 40 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की थी। इसके बाद पठानमाजरा और जौरामाजरा ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।

दोनों नेताओं की नाराजगी के पीछे टिकट और विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी की नियुक्तियों को लेकर मतभेद की चर्चा भी सामने आई। समाना में पूर्व अकाली मंत्री सुरजीत सिंह रखड़ा को विधानसभा क्षेत्र का प्रभारी बनाए जाने के बाद जौरामाजरा के राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें तेज हुई थीं। हालांकि, पार्टी ने इन सीटों पर उम्मीदवारों की आधिकारिक घोषणा नहीं की थी।

India Today

इस घटनाक्रम ने संकेत दिया कि पंजाब में AAP के सामने केवल विपक्षी दलों की चुनौती नहीं है, बल्कि अपने मौजूदा विधायकों और स्थानीय नेताओं को साथ बनाए रखने का सवाल भी है।

पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी चिंता का विषय

पार्टी के भीतर असंतोष केवल विधायकों तक सीमित नहीं बताया जा रहा है। पंजाब में AAP के पुराने कार्यकर्ताओं और जमीनी स्तर के संगठन के बीच भी नाराजगी की खबरें सामने आई हैं।

कुछ कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि पार्टी के सत्ता में आने के बाद लंबे समय तक संगठन खड़ा करने वाले पुराने स्वयंसेवकों को अपेक्षित महत्व नहीं मिला। दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलने और स्थानीय स्तर पर नेतृत्व तक पहुंच की कमी को लेकर भी असंतोष जताया गया है।

नवंबर की शुरुआत में सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी के कुछ पुराने कार्यकर्ताओं को लगता है कि संगठन के फैसलों में उनकी भूमिका पहले जैसी नहीं रह गई है। पार्टी ने हालांकि जिला स्तर पर बैठकें और बूथ स्तर पर संपर्क अभियान शुरू किए हैं, ताकि कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय किया जा सके।

Sunday Guardian Live

2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े भी दे रहे हैं संकेत

पंजाब में AAP की राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं।

2022 में AAP ने पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में से 92 पर जीत दर्ज की थी। पार्टी को करीब 42.3 प्रतिशत वोट मिले थे। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उसका वोट शेयर घटकर लगभग 26.2 प्रतिशत रह गया। उस चुनाव में विधानसभा क्षेत्रों के स्तर पर AAP केवल 33 सीटों पर आगे रही, जबकि कांग्रेस 37 और भाजपा 23 सीटों पर बढ़त बनाने में सफल रही।

ये आंकड़े विधानसभा चुनाव का सीधा परिणाम नहीं बताते, क्योंकि दोनों चुनावों के मुद्दे, उम्मीदवार और परिस्थितियां अलग थीं। फिर भी, इनसे यह स्पष्ट होता है कि 2022 की तुलना में 2024 में AAP को पंजाब में अधिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।

India Today

2027 का चुनाव होगा बड़ी परीक्षा

पंजाब में अगला विधानसभा चुनाव 2027 में होना है। AAP के लिए यह चुनाव केवल सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने संगठन और राजनीतिक आधार को मजबूत साबित करने की भी परीक्षा होगा।

एक तरफ पार्टी को सरकार के कामकाज और चुनावी वादों को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देना होगा। दूसरी तरफ पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने, विधायकों के बीच तालमेल बनाए रखने और स्थानीय नेतृत्व को भरोसे में लेने की चुनौती भी रहेगी।

भाजपा ने AAP छोड़कर आए तीन नेताओं को अपने साथ जोड़कर पंजाब में अपनी राजनीतिक गतिविधियों को गति दी है। वहीं कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल भी राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर भी चर्चाएं हैं, हालांकि किसी गठबंधन को अंतिम रूप दिया जाना अभी अलग विषय है।

NDTV

राष्ट्रीय राजनीति में भी AAP के सामने सवाल

INDIA गठबंधन से अलग होने के बाद AAP को राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वतंत्र रणनीति तैयार करनी होगी। दिल्ली में सत्ता गंवाने, पंजाब में संगठनात्मक चुनौतियों और पार्टी के भीतर असंतोष की खबरों के बीच उसके लिए अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखना महत्वपूर्ण हो गया है।

पंजाब में पार्टी की सरकार अभी उसके पास है, लेकिन आने वाले महीनों में संगठन की एकजुटता, सरकार के प्रदर्शन और जनता के मुद्दों पर उसकी प्रतिक्रिया पर विशेष नजर रहेगी।

कुल मिलाकर, AAP इस समय दोहरी चुनौती से गुजर रही है—राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन से अलग अपनी भूमिका तय करना और पंजाब में अपने राजनीतिक आधार को बनाए रखना। 2027 का विधानसभा चुनाव बताएगा कि पार्टी इन चुनौतियों का सामना किस तरह करती है।

बड़ी खबर