आंदोलन राजनीति का साधन न बने, समाज में विभाजन का खतरा : डॉ. मोहन भागवत
नागपुर, समाज की समस्याओं के खिलाफ आंदोलन होना स्वाभाविक है, लेकिन आंदोलनों का उद्देश्य समस्याओं का समाधान खोजना होना चाहिए। यदि आंदोलन राजनीति का साधन बन जाए या किसी व्यक्ति, समूह अथवा विचार के प्रति शत्रुता की भावना के साथ चलाया जाए, तो इससे समाज में विभाजन पैदा हो सकता है''- यह स्पष्ट संदेश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने दिया। उन्होंने आंदोलनकारियों, शासन-प्रशासन और राजनीतिक नेताओं से अपील की कि उनके कार्यों से समाज में वैमनस्य, कटुता और विभाजन की स्थिति पैदा नहीं होनी चाहिए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के समापन अवसर पर नागपुर के रेशिमबाग मैदान में आयोजित विजयादशमी एवं शस्त्रपूजन समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि समाज में समस्याएं होना और व्यवस्था में कमियां रहना स्वाभाविक है। ऐसी परिस्थितियों में आंदोलन खड़े हो सकते हैं, लेकिन भावनाओं के उफान के बावजूद आंदोलनकारियों का आचरण संविधान और कानून के दायरे में रहना चाहिए। बोलने, व्यवहार करने और एक-दूसरे के साथ संवाद स्थापित करने में शालीनता की मर्यादा का पालन करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक लाभ, सस्ती लोकप्रियता या स्वार्थ के लिए विवेक और सद्भावना को ताक पर नहीं रखा जाना चाहिए। आंदोलन के पीछे यह भावना होनी चाहिए कि देश और समाज अपने हैं तथा व्यवस्था के प्रति हमारी भी जिम्मेदारी है। यदि अन्याय की भावना को लगातार भड़काकर व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा किया जाता है, तो इसका लाभ देश को कमजोर करने वाली शक्तियों को मिल सकता है।
संवाद से सुलझें समस्याएं
डॉ. भागवत ने आह्वान किया कि समाज की सभी समस्याओं का समाधान केवल सरकार के माध्यम से या केवल आंदोलनों के जरिए ही संभव नहीं है। समाज की सक्रिय भागीदारी और आपसी संवाद से भी कई समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है। समाज में एक-दूसरे के प्रति संदेह और कटुता बढ़ाने के बजाय संवाद के माध्यम से पुराने मतभेदों को दूर करने की आवश्यकता है। छोटी-छोटी घटनाओं के आधार पर लोगों को उकसाकर संघर्ष पैदा करने वाली प्रवृत्तियों से दूर रहना चाहिए।
नशे की लत गंभीर राष्ट्रीय समस्या
सरसंघचालक ने युवाओं में बढ़ती नशे की लत और मादक पदार्थों के बढ़ते प्रभाव पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि विवेक और नैतिक मूल्यों के अभाव में युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में आ रही है। यह समस्या केवल किसी परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय चुनौती है। इससे निपटने के लिए शासन, प्रशासन और समाज को मिलकर निर्णायक प्रयास करने होंगे। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी में नैतिक मूल्यों और सद्विवेक को जागृत रखना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। नशे के खिलाफ देशव्यापी जनजागरण और रोकथाम अभियान चलाने के लिए संघ के स्वयंसेवक भी प्रयास करेंगे।
पंच परिवर्तन को दैनिक जीवन में अपनाने पर जोर
संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान किए गए कार्यों का उल्लेख करते हुए डॉ. भागवत ने सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वबोध एवं स्वदेशी और नागरिक कर्तव्यपालन के पांच सूत्रों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पंच परिवर्तन केवल एक वर्ष तक चलने वाला अभियान नहीं है, बल्कि इसे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।विज्ञान, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग पर उन्होंने कहा कि इनके साथ नैतिक अनुशासन और विवेक भी आवश्यक हैं। तकनीक का इस्तेमाल असत्य फैलाने या लोगों को गुमराह करने के लिए नहीं होना चाहिए। इसके प्रति समाज को सजग रहने की जरूरत है।
संत रविदास के योगदान का उल्लेख
डॉ. भागवत ने संत रविदास के योगदान को भी याद किया। उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रमणों और अत्याचारों के दौर में संत रविदास ने धर्मनिष्ठा, सामाजिक समरसता और भक्ति की भावना को जीवित रखा। उन्होंने भयभीत समाज को संबल देने के साथ लोगों का मनोबल बढ़ाने का कार्य किया।
कई प्रमुख हस्तियां रहीं उपस्थित
समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ संपादक संजय गुप्ता उपस्थित थे। इसके अलावा संघ के विदर्भ प्रांत संघचालक दीपक तामशेट्टीवार, विदर्भ प्रांत सहसंघचालक श्रीधर गाडगे और नागपुर महानगर संघचालक राजेश लोया सहित पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ तथा इजरायल के मिडवेस्ट इंडिया स्थित कॉन्सुल जनरल यानिव रेवाच भी मौजूद रहे। समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले, राष्ट्र सेविका समिति की प्रमुख संचालिका शांताक्का, पूर्व सांसद अजय संचेती और विधायक परिणय फुके सहित अनेक जनप्रतिनिधियों ने भाग लिया। मुख्यमंत्री फडणवीस, केंद्रीय मंत्री गडकरी, बावनकुले और विधायक फुके संघ की गणवेश में समारोह में शामिल हुए।














