महाशिवरात्रि : श्री काशी विश्वनाथ को लगी हल्दी, वैवाहिक रस्म की शुरूआत
हल्दी की रस्म में 52 थाल चढ़ावा,नवरत्न जड़ित छत्र तले सजा राजसी श्रृंगार, बांसफाटक से टेढ़ीनीम तक गूंजा ‘हर-हर महादेव’
हल्दी लगते ही बाबा का
स्वरूप दूल्हे के तेज में आलोकित हो उठा। दीपों की आभा, धूप-चंदन की सुवास
और मंत्रों की गंभीर ध्वनि ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
हल्दी अनुष्ठान के दौरान महिलाओं के कंठ से निकले मंगलस्वर महंत आवास परिसर में गूंजते रहे।
“पीली-पीली
हल्दी भोला के लगावा सखी,जल्दी-जल्दी अड़भंगी के भस्म छुड़ावा सखी…”इसके
साथ ही और भी लोकगीत गूंजे—“हल्दी के रंग में रंगलें महादेव,गौरा के संग
सजे आज देवाधिदेव…”
“भोला के अंगना सजी आज बारात,हल्दी लगावें
सखियन…”। इन गीतों के भाव ने स्पष्ट कर दिया कि काशी में शिव केवल आराध्य
नहीं, बल्कि घर के दूल्हे हैं। यहां हर रस्म में परिवार जैसा अपनापन झलकता
है।
शोभायात्रा
की विशेषता रही 52 थालों में सजा चढ़ावा। इन थालों में हल्दी, चंदन, फल,
मेवा और मांगलिक सामग्री सजाई गई थी। श्रद्धालुओं ने इन्हें सिर पर धारण कर
बाबा के विवाहोत्सव में अपनी सहभागिता निभाई। बाबा के ससुराल माने जाने
वाले सारंगनाथ मंदिर से पगड़ी बांधे ससुरालीजन हल्दी लेकर पहुंचे। यह दृश्य
किसी पारंपरिक विवाह से कम नहीं था। महंत लिंगिया महाराज के नेतृत्व में
ससुराली परंपरा निभाई गई।
11 वैदिक ब्राह्मणों के मंत्रोच्चार से संपन्न हुआ पूजन
टेढ़ीनीम
आवास पहुंचने पर 11 वैदिक ब्राह्मणों ने विधि-विधान से पूजन संपन्न कराया।
मंत्रों की गूंज और घी के दीपों की रोशनी के बीच बाबा की पंचबदन प्रतिमा
पर हल्दी अर्पित की गई। सायंकाल आयोजन से जुड़े संजीव रत्न मिश्र ने बाबा
का भव्य श्रृंगार किया। इसी क्रम में महंत वाचस्पति तिवारी के सानिध्य में
नवरत्न जड़ित छत्र का विधिवत पूजन किया गया। छत्र के नीचे विराजमान बाबा का
स्वरूप राजसी और अलौकिक प्रतीत हुआ—मानो स्वयं कैलाशपति विवाहोत्सव के लिए
काशी के आंगन में विराजे हों। श्रद्धालु देर शाम तक दर्शन करते रहे और
वातावरण में भक्ति की अविरल धारा बहती रही।















