विश्व राजनीति में इन दिनों आर्थिक मोर्चे पर भी उतनी ही आक्रामक लड़ाई चल रही है, जितनी कि किसी युद्ध के मैदान की आवश्यकता रहती है। कभी प्रतिबंध, कभी तकनीकी नियंत्रण, कभी वित्तीय दबाव और अब टैरिफ, वस्तुत: ताकतवर देश हर आर्थिक हथियार का इस्तेमाल कर रहे हैं। बड़ा उदाहरण हमारे सामने ब्राजील पर अमेरिका का अचानक 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाना है।

एक तरह से कहें तो यह उन सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है, जोकि अपनी विदेश नीति स्वतंत्र रूप से तय करना चाहती हैं। भारत भी उन्हीं देशों में शामिल है, इसलिए जो संभावना बन रही है, वह यही है कि अमेरिका ने जैसे सेक्शन-301 प्रावधानों का उपयोग कर ब्राजील की बड़ी अर्थव्यवस्था पर अपनी कार्रवाई की, वैसे ही वह भारत के साथ भी कर सकता है। अत: भारत को अपने भविष्य के संभावित आर्थिक दबावों के प्रति बहुत सतर्क रहने की जरूरत है।

यह तो अच्छा है जो आज का भारत बीस वर्ष पहले वाला नहीं है। वह वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक निर्णायक केंद्र बनता जा रहा है। वह ब्रिक्स का प्रभावशाली सदस्य है। इंडो-पैसिफिक में उसकी भूमिका लगातार मजबूत हुई है। रूस से लेकर पश्चिम एशिया तक उसने अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संतुलित विदेश नीति अपनाई है। यही स्वायत्तता एक तरह से देखें तो भारत की सबसे बड़ी ताकत है, किंतु यही कुछ महाशक्तियों की असहजता का कारण भी है।

डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति को देखें तो एक बात बिल्कुल स्पष्ट है, उनके लिए टैरिफ राजनीतिक और सामरिक दबाव का सबसे प्रभावी हथियार है। अपने पिछले कार्यकाल में उन्होंने चीन, कनाडा, मैक्सिको, यूरोपीय संघ और भारत सहित अनेक देशों पर टैरिफ लगाकर यह संकेत दिया था कि अमेरिका अपने आर्थिक हितों के लिए किसी भी स्तर तक जा सकता है। ट्रंप स्वयं कई बार सार्वजनिक रूप से टैरिफ की प्रशंसा कर चुके हैं। इसलिए यदि भविष्य में उनकी सरकार फिर से कठोर व्यापारिक नीति अपनाती है, तो भारत को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि वर्तमान में जिस तरह के हालात दिख रहे हैं, उनमें यही दिखता है।

दूसरी ओर ब्राजील पर की गई कार्रवाई ने इस आशंका को और गहरा किया है। अमेरिकी अधिकारियों ने अपने तर्कों में ब्राजील के भारत और मैक्सिको के साथ बढ़ते व्यापारिक संबंधों का भी उल्लेख किया है। इसे संयोग नहीं माना जा सकता है। वहीं, भू-राजनीति में यह स्वष्ट दिखाई भी दे रहा है कि कैसे ब्रिक्स का विस्तार हो रहा है, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर चर्चा हो रही है। डॉलर पर निर्भरता कम करने की बातें सामने आ रही हैं और वैश्विक दक्षिण अपनी अलग आर्थिक पहचान बनाने का प्रयास कर रहा है। स्वाभाविक है कि अमेरिका इन परिवर्तनों को अपने लिए चुनौती के रूप में देख रहा है।

भारत के संदर्भ में सबसे संवेदनशील एक विषय फिर रूस से कच्चे तेल की खरीद भी है। यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उसकी पहली प्राथमिकता अपने नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा है। भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदना जारी रखा और इसका सीधा लाभ देश की अर्थव्यवस्था को मिला। अब अमेरिका में ऐसे प्रस्ताव सामने आए हैं, जिनमें रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की बात कही जा रही है। भारत और चीन जैसे देश इस चर्चा के केंद्र में हैं। यह संकेत पर्याप्त है कि अमेरिका आर्थिक दबाव की नीति को आगे बढ़ाने के विकल्प खुले रखना चाहता है।

यहां एक दिलचस्प बात यह भी है कि रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले कई यूरोपीय देशों के लिए अलग दृष्टिकोण दिखाई देता है, जिसमें कि भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यह है कि अब अकेले राजनीतिक कूटनीति से काम नहीं चलेगा, उसे अपनी आर्थिक कूटनीति को भी बहुत मजबूत बनाना होगा। यदि किसी एक देश का निर्णय भारतीय निर्यात को प्रभावित कर सकता है, तो इसका समाधान यही है कि भारत अपने निर्यात बाजार का तेजी से विस्तार करे, जैसा कि इन दिनों एफटीए के रूप में हम देख भी रहे हैं। फिर किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत यही होती है कि वह एक बाजार पर निर्भर न रहे।

एक बार को यदि एतिहासिक संदर्भ में इस पूरे प्रकरण को देखें तो ध्यान में आता है कि बाहरी दबाव अकसर उन राष्ट्रों को और अधिक मजबूत बना देते हैं जो दूरदर्शिता के साथ अपनी नीतियां तय करते हैं। 1998 के परमाणु परीक्षण से लेकर कई बार के वैश्विक दबावों के उदाहरण हमारे सामने हैं। कहना होगा कि आज भी परिस्थितियां वैसी ही पैदा करने के प्रयास हो रहे हैं। यदि भविष्य में अमेरिका टैरिफ को दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है, तो भारत के सामने इसका सबसे बड़ा जवाब यही होगा कि वह अपनी आर्थिक क्षमता को और अधिक मजबूत बनाए।

वैसे भी भारत आज विश्व की सबसे युवा कार्यशक्ति, विशाल घरेलू बाजार, तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था, मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं और निरंतर बढ़ती वैश्विक साख के साथ आगे बढ़ रहा है। ऐसे राष्ट्र की प्रगति को सिर्फ टैरिफ के सहारे लंबे समय तक नहीं रोका जा सकता। चुनौती अवश्य आएगी, इसलिए यह समय अपनी तैयारी का है। यदि भारत अपनी आर्थिक कूटनीति, ऊर्जा सुरक्षा, विनिर्माण क्षमता और वैश्विक व्यापारिक साझेदारियों को और मजबूत करता है, तो कोई भी बाहरी दबाव उसकी विकास यात्रा को रोक नहीं सकेगा। फिर संत तुलसीदास जी अपने रचित ग्रंथ रामचरितमानस के (बालकांड) में कह ही गए हैं-

सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥

समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥

इसका विस्तृत अर्थ यही है कि जिस प्रकार गंगाजी में पवित्र और अपवित्र (सभी तरह का) जल बहता है, फिर भी कोई गंगा को दूषित या अपवित्र नहीं कहता; सूर्य संसार की अच्छी-बुरी हर चीज को प्रकाशित करता है और अग्नि सभी चीजों को जलाकर भी स्वयं पवित्र रहती है, उसी प्रकार सामर्थ्यवान (समर्थ) व्यक्ति पर कोई दोष नहीं लगता।