नेपाल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों पर इस्तीफे के अंतरराष्ट्रीय दबाव को सरकार ने बताया काल्पनिक
काठमांडू, नेपाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों पर
इस्तीफा देने का दबाव बनाए जाने संबंधी तीन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार
संस्थाओं के संयुक्त बयान को पूरी तरह काल्पनिक और निराधार करार दिया है।
प्रतिनिधि
सभा की कानून, न्याय एवं संसदीय समिति की बैठक में उठे सवालों का जवाब
देते हुए बुधवार को कानून मंत्री सोबिता गौतम ने कहा कि एमनेस्टी
इंटरनेशनल, इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स (आईसीजे) और ह्यूमन राइट्स वॉच
के संयुक्त बयान में लगाए गए आरोपों का कोई आधार नहीं है। इन तीनों
संस्थाओं ने अपने संयुक्त बयान में दावा किया था कि नेपाल के सुप्रीम कोर्ट
के तीन न्यायाधीशों पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया है और इस्तीफा नहीं
देने पर उनके खिलाफ महाभियोग लाने की चेतावनी दी गई है।
साथ ही
बयान में यह भी कहा गया था कि वरिष्ठता की अनदेखी करके प्रधान न्यायाधीश की
नियुक्ति की गई। संवैधानिक परिषद संबंधी अध्यादेश उचित नहीं था तथा प्रधान
न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत पर संसदीय सुनवाई समिति में सार्थक चर्चा नहीं
हुई।
इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए मंत्री गौतम ने कहा, "यह
पूरी तरह काल्पनिक है।" उन्होंने कहा कि यह मामला नेपाल की संप्रभुता में
हस्तक्षेप का प्रयास है और इस विषय पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया
जा सकता। मंत्री गौतम ने यह भी आरोप लगाया कि इस बयान में राजनीतिक
पूर्वाग्रह झलकता है। उन्होंने कहा, "इसमें राजनीतिक गंध दिखाई देती है।"
संयुक्त
बयान में सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल, हरि फुयाल और
कुमार रेग्मी का नाम लेते हुए दावा किया गया था कि उन पर इस्तीफा देने का
दबाव डाला गया और ऐसा न करने पर महाभियोग की चेतावनी दी गई।
कानून
मंत्री ने कहा कि इन गंभीर आरोपों के समर्थन में संबंधित संस्थाओं को ठोस
आधार और प्रमाण सार्वजनिक करने चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि संसद में
किसी भी विषय पर प्रश्न उठाए जा सकते हैं, लेकिन बिना किसी साक्ष्य के
बाहरी संस्थाओं द्वारा नेपाल के आंतरिक मामलों पर अनावश्यक टिप्पणी करना
उचित नहीं है।

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