नेतन्याहू ने ट्रंप पर लगाया था बड़ा दांव, लेकिन दोनों को मिली हार; ईरान युद्ध और चुनावी नतीजों ने बदली अमेरिका-इजरायल की राजनीति
नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच मजबूत राजनीतिक और रणनीतिक रिश्तों को लेकर अब नए सवाल उठने लगे हैं। अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की करारी हार और इजरायल के आम चुनाव में नेतन्याहू के गठबंधन को बहुमत नहीं मिलने से दोनों नेताओं की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ गई हैं। जिस रणनीति के तहत नेतन्याहू ने ट्रंप के साथ अपने करीबी संबंधों को इजरायल की ताकत और अपनी राजनीतिक सफलता का आधार बनाया था, वही रणनीति अब उनके लिए चुनौती बनती दिखाई दे रही है। अल जजीरा की 4 नवंबर 2026 की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के समर्थन में चुनाव से पहले खुलकर प्रचार किया था। लेकिन नतीजे उनकी उम्मीदों के विपरीत रहे। अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी ने कांग्रेस के दोनों सदनों में बढ़त हासिल की, जबकि इजरायल में नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत से पीछे रह गया। अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा। डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) और सीनेट (Senate) दोनों में नियंत्रण हासिल कर लिया। इस नतीजे से ट्रंप के लिए राष्ट्रपति पद के शेष कार्यकाल में अपनी नीतियों को लागू करना पहले की तुलना में मुश्किल हो सकता है। कांग्रेस में विपक्ष की मजबूत स्थिति के कारण बजट, विदेश नीति से जुड़े वित्तीय फैसलों और प्रशासनिक कामकाज पर निगरानी बढ़ने की संभावना है। विश्लेषकों के मुताबिक, ईरान के साथ युद्ध, बढ़ती ऊर्जा कीमतें और इजरायल को अमेरिकी समर्थन जैसे मुद्दे चुनाव में महत्वपूर्ण रहे। इजरायल में 27 अक्टूबर को हुए आम चुनाव के नतीजों ने भी नेतन्याहू की मुश्किलें बढ़ा दीं। उनकी दक्षिणपंथी गठबंधन सरकार को 120 सदस्यीय संसद (नेसेट) में केवल 53 सीटें मिलीं, जबकि सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है। वहीं, पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिलीं। अरब पार्टियों के दो गठबंधनों को कुल 19 सीटें हासिल हुईं। ऐसे में अगली सरकार के गठन में अरब पार्टियों और अन्य छोटे राजनीतिक दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। नेतन्याहू की पार्टी ने चुनावी नतीजों पर सवाल उठाए और अरब पार्टियों के समर्थन में कथित विदेशी हस्तक्षेप के आरोप लगाए। हालांकि, 4 नवंबर को इजरायल के केंद्रीय चुनाव आयोग ने नतीजों को प्रमाणित कर दिया और चुनावी धोखाधड़ी के आरोपों को खारिज कर दिया। ट्रंप और नेतन्याहू की राजनीतिक मुश्किलों के पीछे ईरान युद्ध को एक बड़ा कारण माना जा रहा है। फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई की और पूरे मध्य पूर्व में क्षेत्रीय संघर्ष का खतरा बढ़ गया। नेतन्याहू को उम्मीद थी कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई से इजरायल की सुरक्षा मजबूत होगी और उनकी राजनीतिक स्थिति भी बेहतर होगी। दूसरी तरफ ट्रंप ने भी इस अभियान को अमेरिकी हितों और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बताया था। लेकिन युद्ध के कारण ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता, तेल की कीमतों पर दबाव और अमेरिकी जनता में विदेशों में सैन्य हस्तक्षेप को लेकर नाराजगी बढ़ी। विश्लेषकों का मानना है कि इन मुद्दों ने अमेरिकी चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के खिलाफ माहौल बनाने में भूमिका निभाई। अमेरिका और इजरायल के रिश्तों में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा सैन्य सहायता का है। अमेरिका लंबे समय से इजरायल का सबसे बड़ा सैन्य और कूटनीतिक सहयोगी रहा है। दोनों देशों के बीच मौजूदा समझौते के तहत अमेरिका इजरायल को 10 वर्षों में 38 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी बीच ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका 2027 से इजरायल को मिलने वाली लगभग 4 अरब डॉलर की सालाना सहायता बंद करेगा। ट्रंप का कहना है कि इजरायल अब अमेरिकी आर्थिक सहायता पर पहले की तरह निर्भर नहीं है। हालांकि, इस फैसले को लागू करने में अमेरिकी कांग्रेस की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। इजरायल के विपक्षी नेताओं ने इस घोषणा को नेतन्याहू की विदेश नीति की विफलता से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि इजरायल की सुरक्षा के लिए अमेरिका के साथ मजबूत और द्विदलीय संबंध बनाए रखना जरूरी है। इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू अमेरिका में इजरायल को लेकर बदलता राजनीतिक नजरिया भी है। पहले इजरायल को अमेरिका की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का व्यापक समर्थन प्राप्त था। लेकिन गाजा युद्ध और ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान के बाद अमेरिकी राजनीति में इस समर्थन को लेकर मतभेद बढ़े हैं। नेतन्याहू ने लंबे समय तक रिपब्लिकन पार्टी और विशेष रूप से ट्रंप के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाया। लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी के कांग्रेस में मजबूत होने से इजरायल को मिलने वाली अमेरिकी सहायता, सैन्य सहयोग और विदेश नीति पर नए सिरे से बहस होने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, नेतन्याहू ने अपनी रणनीति में ट्रंप के साथ करीबी संबंधों को बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया था। उन्हें उम्मीद थी कि इससे इजरायल को अमेरिका का मजबूत समर्थन मिलेगा और घरेलू राजनीति में भी उनकी स्थिति बेहतर होगी। लेकिन अब तस्वीर अलग दिखाई दे रही है। अमेरिका में ट्रंप की पार्टी को चुनावी झटका लगा है और इजरायल में नेतन्याहू बहुमत से दूर हैं। हालांकि, दोनों नेताओं की राजनीतिक स्थिति अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। ट्रंप के पास राष्ट्रपति पद की शक्तियां हैं, जबकि नेतन्याहू के सामने गठबंधन बनाने की संभावना अभी भी मौजूद है। इजरायल में सरकार गठन की प्रक्रिया और अमेरिका में कांग्रेस के साथ ट्रंप के संबंध आगे की राजनीति तय करेंगे। अमेरिका और इजरायल के रिश्तों में आने वाले समय में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं। डेमोक्रेटिक नियंत्रण वाली कांग्रेस इजरायल को दी जाने वाली सहायता और मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य नीति की अधिक सख्ती से समीक्षा कर सकती है। वहीं, इजरायल में विपक्षी दल नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने के लिए गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर, ईरान के साथ युद्ध और क्षेत्रीय सुरक्षा का मुद्दा दोनों देशों के लिए चुनौती बना रहेगा।
अमेरिका में ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका
इजरायल में नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से दूर
ईरान युद्ध बना दोनों नेताओं की परेशानी की बड़ी वजह
इजरायल को मिलने वाली अमेरिकी सहायता पर भी सवाल
अमेरिका में इजरायल के समर्थन को लेकर बदल रही सोच
क्या नेतन्याहू और ट्रंप की राजनीतिक रणनीति विफल हो गई?

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