झारखंड आंदोलन की माटी से निकले जननेता: एक व्यंग्य ने सुदिव्य कुमार सोनू को बनाया दिशोम गुरु का सिपाही

गिरिडीह: झारखंड के मंत्री और गिरिडीह सदर विधायक सुदिव्य कुमार सोनू का अचानक निधन राज्य की राजनीति के लिए बड़ी क्षति है। 54 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले सोनू का राजनीतिक सफर किसी राजनीतिक परिवार की विरासत से नहीं, बल्कि संघर्ष, विचार और झारखंड की माटी के प्रति गहरे जुड़ाव से शुरू हुआ था। करीब साढ़े तीन दशक के राजनीतिक जीवन में उन्होंने एक सामान्य कार्यकर्ता से लेकर राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री तक का सफर तय किया।

‘अलग राज्य बना लोगे?’—एक व्यंग्य ने पैदा कर दी टीस

सुदिव्य कुमार सोनू का परिवार राजनीति से दूर रहा था। उनके परिवार की कई पीढ़ियां सरकारी सेवा से जुड़ी रही थीं। युवा अवस्था में जब वह उत्तर बिहार में पढ़ाई कर रहे थे, उस दौर में अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन तेज था।

इसी दौरान सहपाठियों और आसपास के लोगों की ओर से उन्हें अक्सर तंज सुनने को मिलता था—‘अलग राज्य बना लोगे?’

यह बात भले ही व्यंग्य के तौर पर कही जाती रही हो, लेकिन सुदिव्य सोनू के मन में यह गहरी टीस छोड़ गई। अपने क्षेत्र, अपनी माटी और झारखंड के अधिकारों को लेकर उनके भीतर एक नई बेचैनी पैदा हुई। यही बेचैनी आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन की दिशा तय करने वाली बनी।

1989 में दिशोम गुरु से मुलाकात बनी जीवन का टर्निंग पॉइंट

साल 1989 में सुदिव्य कुमार सोनू की मुलाकात झामुमो के संस्थापक और झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेता दिशोम गुरु शिबू सोरेन से हुई। यह मुलाकात उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुई।

बताया जाता है कि शिबू सोरेन ने जब जाना कि सोनू पढ़े-लिखे युवा हैं, तो उनके कंधे पर हाथ रखते हुए उनसे कहा कि अगर उनके जैसे पढ़े-लिखे युवा अलग राज्य के आंदोलन में शामिल नहीं होंगे, तो आंदोलन आगे कैसे बढ़ेगा?

गुरुजी के इन शब्दों ने युवा सुदिव्य के मन पर गहरा प्रभाव डाला। इसके बाद उन्होंने पारंपरिक करियर की राह के बजाय झारखंड की माटी और अधिकारों की लड़ाई को अपना रास्ता चुना और झारखंड मुक्ति मोर्चा से जुड़कर सक्रिय राजनीति में उतर गए।

परिवार राजनीति के खिलाफ था, फिर गुरुजी ने बदल दिया नजरिया

राजनीति में आने के बाद सुदिव्य सोनू को परिवार के विरोध का भी सामना करना पड़ा। उनके पिता चाहते थे कि बेटा अपना करियर बनाए, लेकिन सोनू लगातार संगठन और आंदोलन के काम में जुटे रहे।

करीब 2004-05 के दौरान एक भावुक घटना ने परिवार की सोच बदल दी। शिबू सोरेन खुद सुदिव्य सोनू के गिरिडीह स्थित घर पहुंचे। जब उनके पिता सामने आए, तो गुरुजी ने उनका सम्मान करते हुए पैर छुए और उनका हाथ थामकर भरोसा दिलाया कि वह उनके बेटे को अपने साथ ले जा रहे हैं और उसे आगे बढ़ाएंगे।

इस मुलाकात के बाद सुदिव्य के पिता का उनके राजनीतिक जीवन को लेकर नजरिया बदल गया और उन्होंने बेटे के फैसले का विरोध करना बंद कर दिया।

संगठन से सत्ता तक, साढ़े तीन दशक का सफर

सुदिव्य कुमार सोनू ने राजनीति की शुरुआत एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में की। लंबे समय तक संगठन में सक्रिय रहने के बाद उन्होंने गिरिडीह में अपनी मजबूत राजनीतिक पहचान बनाई। करीब 35 वर्षों के राजनीतिक सफर में उन्होंने पार्टी संगठन में कई जिम्मेदारियां निभाईं और धीरे-धीरे झामुमो के भरोसेमंद नेताओं में शामिल हो गए।

वर्ष 2019 में उन्होंने पहली बार गिरिडीह सदर विधानसभा सीट से चुनाव जीता। इसके बाद 2024 में भी जनता ने उन्हें दोबारा विधानसभा भेजा। हेमंत सोरेन सरकार में उन्हें कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिली।

छात्रों से संवाद कराने में भी निभाई अहम भूमिका

मंत्री बनने के बाद भी सुदिव्य कुमार सोनू की पहचान केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रही। वह संगठन और सरकार के बीच संवाद कायम करने वाले नेताओं में शामिल रहे।

हाल के वर्षों में JPSC-JSAC से जुड़े छात्र विवाद के दौरान उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों से संवाद स्थापित करने और सरकार तथा छात्रों के बीच गतिरोध कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

एक कार्यकर्ता, जिसने आखिरी सांस तक निभाया माटी का रिश्ता

सुदिव्य कुमार सोनू का राजनीतिक जीवन इस बात की मिसाल रहा कि बिना राजनीतिक विरासत के भी संगठन, संघर्ष और जनसरोकारों के दम पर राजनीति में अपनी जगह बनाई जा सकती है।

जिस व्यंग्य ने एक युवा के मन में झारखंड के प्रति टीस पैदा की थी, वही टीस आगे चलकर उसे दिशोम गुरु शिबू सोरेन का सिपाही बना गई। सामान्य परिवार से निकला वह युवा करीब साढ़े तीन दशक बाद झारखंड सरकार में मंत्री बना।

उनका जाना केवल एक मंत्री या विधायक का निधन नहीं, बल्कि झारखंड आंदोलन की उस पीढ़ी के एक सक्रिय चेहरे का विदा होना है, जिसने आंदोलन की जमीन से संगठन और सत्ता तक का सफर तय किया।