न्यायपालिका पर न्याय, निष्पक्षता और संवैधानिक अधिकारों के प्रति आम नागरिक का विश्वास टिका होता है। न्यायालय के भीतर अनुशासन, पद की मर्यादा और परस्पर सम्मान का विशेष महत्व है लेकिन जब न्यायालय की कार्यवाही के दौरान किसी घटना को लेकर न्यायाधीश और अधिवक्ता के आचरण पर सवाल उठने लगता है तो यह केवल संबंधित व्यक्तियों तक सीमित विषय नहीं रह जाता बल्कि न्यायिक व्यवस्था की कार्य संस्कृति और संस्थागत गरिमा पर व्यापक बहस का कारण बन जाता है।

हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्याय कक्ष संख्या-49 में न्यायमूर्ति अजय भनोट से संबंधित एक घटनाक्रम को लेकर अधिवक्ताओं के बीच असंतोष की चर्चा सामने आई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, न्यायालय में एक जनपद के पुलिस अधीक्षक के प्रथम पंक्ति में बैठने और एक अधिवक्ता द्वारा उनसे पीछे बैठने का अनुरोध किए जाने के बाद विवाद उत्पन्न हुआ। बताया जाता है कि संबंधित अधिवक्ता के व्यवहार की शिकायत न्यायमूर्ति के समक्ष की गई। इसके बाद न्यायमूर्ति की प्रतिक्रिया, अधिवक्ता को जेल भेजने की कथित चेतावनी, पुलिस अधीक्षक से माफी मांगने के निर्देश और वरिष्ठ अधिवक्ता वी.पी. श्रीवास्तव के प्रति कथित टिप्पणी को लेकर अधिवक्ताओं ने आपत्ति जताई। इस घटनाक्रम के विरोध में मुख्य न्यायाधीश के समक्ष शिकायत करने तथा न्यायालय की कार्यवाही के बहिष्कार का निर्णय लेने की बात भी सामने आई। हालांकि, इन घटनाओं के सभी पहलुओं की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना आवश्यक है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्य, परिस्थितियां और लागू न्यायिक नियमों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। फिर भी यह घटना कुछ बुनियादी सवाल खड़ा करता है, जिस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।

पहला सवाल यह है कि न्यायालय के भीतर पुलिस अधीक्षक अथवा किसी अन्य प्रशासनिक अधिकारी के बैठने की व्यवस्था किस नियम और परंपरा के अनुसार निर्धारित होती है? क्या अधिकारियों के लिए अलग से कुर्सी या निर्धारित स्थान की व्यवस्था है? क्या प्रथम पंक्ति में बैठने का कोई विशेष प्रोटोकॉल है? यदि ऐसी व्यवस्था है तो उसका स्पष्ट पालन होना चाहिए ताकि किसी प्रकार की गलतफहमी या अनावश्यक विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो। न्यायालय में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति की अपनी भूमिका और गरिमा होती है। न्यायाधीश न्यायिक कार्यवाही का संचालन करते हैं, अधिवक्ता पक्षकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं और पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारी कानून के क्रियान्वयन एवं न्यायिक प्रक्रिया में आवश्यक सहयोग प्रदान करते हैं। किसी अधिकारी का प्रशासनिक पद उसे न्यायालय में अधिवक्ताओं से ऊपर कोई विशेष न्यायिक अधिकार नहीं देता। उसी प्रकार अधिवक्ता होने का अर्थ भी यह नहीं है कि वह न्यायालय के निर्धारित अनुशासन की उपेक्षा कर सकता है।

इसलिए बैठने की व्यवस्था को प्रतिष्ठा अथवा पद की प्रतिस्पर्धा बनाने के बजाय स्पष्ट नियमों और समान रूप से लागू होने वाली परंपराओं के आधार पर संचालित किया जाना चाहिए।

न्यायाधीश को न्यायालय की गरिमा बनाए रखने, अनुशासन कायम करने और न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालने वाले व्यवहार पर विधिसम्मत कार्रवाई का अधिकार प्राप्त है। न्यायालय की अवमानना से संबंधित कानून भी न्यायिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा और कार्यप्रणाली की रक्षा के लिए मौजूद है लेकिन अधिकारों का प्रयोग करते समय संयम, निष्पक्षता और परिस्थितियों के अनुरूप प्रतिक्रिया उतनी ही महत्वपूर्ण है। न्यायालय में कोई अनुचित व्यवहार होता है तो उसकी प्रकृति, उद्देश्य और प्रभाव को समझकर कानून के अनुरूप कदम उठाना चाहिए। यदि किसी अधिवक्ता ने अनुचित भाषा का प्रयोग किया है तो उसे उचित प्रक्रिया के तहत समझाया जा सकता है या आवश्यक कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन यदि किसी अधिवक्ता को तत्काल जेल भेजने की चेतावनी दिये जाने अथवा माफी मांगने के लिए बाध्य किये जाने संबंधी आरोप सही पाये जाते हैं तो उन पर संस्थागत स्तर पर निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक होगी। न्यायाधीश का पद जितना अधिकारपूर्ण है, उतना ही उत्तरदायित्वपूर्ण भी।

टकराव नहीं, सहयोग जरूरी

न्यायिक व्यवस्था में न्यायाधीश और अधिवक्ता एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि न्याय प्रदान करने की प्रक्रिया के दो महत्वपूर्ण अंग हैं। न्यायाधीश को अधिवक्ता के तर्कों और कानूनी दलीलों को सुनना होता है, जबकि अधिवक्ता का कर्तव्य है कि वह न्यायालय के प्रति सम्मान बनाए रखते हुए अपने मुवक्किल का पक्ष प्रस्तुत करे। दोनों के बीच मतभेद हो सकते हैं लेकिन मतभेद को व्यक्तिगत टकराव में बदलना न्यायिक हित में नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ताओं का अनुभव और योगदान न्यायालय की कार्यसंस्कृति को समृद्ध करता है। दूसरी ओर, न्यायाधीश की गरिमा और न्यायिक अधिकारों का सम्मान भी न्यायिक व्यवस्था के लिए अनिवार्य है। किसी एक पक्ष की गरिमा की रक्षा दूसरे पक्ष के सम्मान को ठेस पहुंचाकर नहीं की जा सकती।

बहिष्कारः समाधान या संवाद का विकल्प?

अधिवक्ताओं द्वारा न्यायालय की कार्यवाही के बहिष्कार का निर्णय लेना भी गंभीर विषय है, यदि अधिवक्ताओं को लगता है कि उनके सम्मान और अधिकारों की अनदेखी हुई है तो शिकायत दर्ज कराना, बार एसोसिएशन के माध्यम से अपना पक्ष रखना और मुख्य न्यायाधीश से निष्पक्ष हस्तक्षेप का अनुरोध करना संस्थागत समाधान की दिशा में कदम हो सकते हैं। न्यायालय की कार्यवाही के बहिष्कार से मुकदमों की सुनवाई प्रभावित हो सकती है और न्याय की प्रतीक्षा कर रहे पक्षकारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए विरोध का कोई भी तरीका अपनाते समय आम नागरिकों के हितों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

मर्यादा सबके लिए समान है

इस पूरे प्रकरण का केंद्रीय प्रश्न यही है कि क्या न्यायालय में अनुशासन बनाए रखने के नाम पर किसी व्यक्ति की गरिमा की उपेक्षा की जा सकती है? इसका उत्तर स्पष्ट है- नहीं। अनुशासन आवश्यक है लेकिन उसके साथ निष्पक्षता और मानवीय मर्यादा भी उतनी ही आवश्यक है। न्यायाधीश, अधिवक्ता और प्रशासनिक अधिकारी तीनों को अपनी-अपनी सीमाओं और जिम्मेदारियों का बोध होना चाहिए।

अंततः न्यायालय की गरिमा किसी एक व्यक्ति के अधिकार से नहीं बल्कि वहां उपस्थित सभी के संयम, सम्मान और संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन से बनती है। जब न्यायाधीश का विवेक, अधिवक्ता की मर्यादा और प्रशासनिक अधिकारी का अनुशासन एक साथ कायम रहते हैं, तभी न्याय की प्रतिष्ठा सुरक्षित रहती है। यही वह संतुलन है, जिसके टूटने पर केवल न्याय कक्ष का वातावरण नहीं बल्कि आम नागरिक का न्याय व्यवस्था पर विश्वास भी प्रभावित हो सकता है।